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महिलाओं के समक्ष आने वाली प्रतिकूल परिस्थितियां ही उनकी अन्य पहचानों के निर्धारण को प्रतिच्छेद और गुणित करते हैं-डॉ स्वाति राणे

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Gendered Impact of the Catastrophic Second Wave of COVID-19 Pandemic: Way Forward towards Combating the Third Wave in India

ज्ञातव्य है कि वैश्विक COVID-19 आपदा की दूसरी लहर ने मानव जीवन के हर क्षेत्र को अगाध रूप  से प्रभावित करते हुए सामाजिक असमानताओं को भी  काफी हद तक बढ़ा दिया है। इसी संदर्भ में, विशेषकर “महिलाओं पर COVID-19 के प्रभाव” को समझने के क्रम में IMPRI -प्रभाव एवं नीति अनुसंधान( नई दिल्ली) ने 15 जून, 2021 को अपने “लिंग प्रभाव अध्ययन केंद्र [Gender Impact Studies Center]” के माध्यम से भारत में तीसरी लहर का मुकाबला करने की दिशा में  “COVID-19 महामारी की भयावह दूसरी लहर का लैंगिक प्रभाव: आगे का रास्ता”  नामक विषय पर एक पैनल चर्चा का आयोजन किया।

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Dr. Swati Rane

महिलाओं के समक्ष आने वाली प्रतिकूल परिस्थितियां ही उनकी अन्य पहचानों के निर्धारण  को प्रतिच्छेद और गुणित करते हैं- डॉ स्वाति राणे

डॉ स्वाति राणे [सेवाशक्ति हेल्थकेयर कंसल्टेंसी की मुख्‍य कार्यपालक अधिकारी (CEO) एवं  क्लिनिकल नर्सिंग रिसर्च सोसाइटी की उपाध्यक्ष व जन स्वास्थ्य अभियान, मुंबई की कोर कमेटी के सदस्या], ने जोर देकर कहा कि इस वैश्विक महामारी में पेशेवर रूप से देखभाल करने वाला प्रत्येक वह व्यक्ति एक “स्वास्थ्य देखभाल कार्यकर्ता” है। विशेषत: महिलाएं पूरे विश्व में प्राथमिक देखभाल कर्मी की भूमिका निभा रही हैं।

स्वास्थ्य कर्मियों की परिभाषा को नए सिरे से परिभाषित करने की जरूरत- डॉ स्वाति राणे

महिला स्वास्थ्य देखभाल कर्मियों के खिलाफ हिंसा का विषय समाज में लैंगिक शक्ति के नकारात्मक उत्कर्ष का परिचायक है। ध्यातव्य है कि लैंगिक नेतृत्व के अंतराल समाज में व्याप्त मुख्य कारकों जैसे कि  रूढ़िवादिता, भेदभाव, शक्ति असंतुलन और विशेषाधिकार आदि द्वारा संचालित होते हैं।

समाज में महिलाओं की वंचित स्थिति

नेतृत्व-अंतराल की समाप्ति की आवश्यकता : वैश्विक स्वास्थ्य और देखभाल कार्यबल के संदर्भ में,  लैंगिक समानता और नेतृत्व को सुनिश्चित किए जाने की दिशा में प्रमुखतया से  विश्व स्वास्थ्य संगठन(WHO),वैश्विक स्वास्थ्य में महिलाएं(WGH),वैश्विक स्वास्थ्य कार्यबल नेटवर्क (GHWN) आदि वैश्विक स्वास्थ्य संगठनों एवं स्वास्थ्य मापकों  के सहयोग एवं मार्गदर्शन की नितांत आवश्यकता है।

महिलाओं की अहितकर परिस्थितियाँ मुख्य तौर पर समाज में व्याप्त “जाति और वर्ग” जैसी अन्य पहचानों के साथ प्रतिच्छेदित और गुणित होते हैं, अर्थात् लिंगभेद के अंतर्गत महिला असमानता के पहलूओं को बढ़ावा देते हैं।

अतः निर्णय लेने में महिलाओं की बराबरी की जरूरत है। यह एक रोचक तथ्य है कि 68वें  राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (NSSO)रिपोर्ट के अनुसार – भारत में, स्वास्थ्य देखभाल कर्मचारियों, नर्सों और दाइयों की विभिन्न श्रेणियों में महिलाओं का लगभग 50% स्वास्थ्य कार्यबल संलग्न है, जिनमें महिलाओं का वर्चस्व 88% है।

 यह भी अनुमान है कि वैश्विक स्वास्थ्य कार्यबल में  लगभग 70% महिलाएं कार्यरत हैं और  यह विडंबना ही है कि उनमें से  केवल 25% महिलाएँ ही वरिष्ठ पदों की भूमिकाएँ निभाती हैं। यह भी विचारणीय पहलू है कि ज्यादातर सफाई कर्मियों की अनदेखी की जाती है। इस संदर्भ में देश के राज्य सरकारों की भी दुर्बलता रही है कि उन्होंने  अबतक अपने कर्मचारियों के लिए एक समान नीतियों को लागू  नहीं  किया है।

इसी क्रम में, यह एक दुखद एवं कटु सत्य  है कि हमारे  देश में वर्तमान कोरोनाकाल में उन  सफाई कर्मचारियों के बारे में केंद्र सरकार ने कोई डेटा नहीं रखा है जिनकी COVID-19 महामारी के कारण मृत्यु हो गई है।

सभी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं में से, लगभग 50% नर्सों का वैश्विक और राष्ट्रीय स्वास्थ्य नेतृत्व में काफी कम प्रतिनिधित्व रहा है। भारत सरकार की एक पहल SAATHI [System for Assessment, Awareness and Training for Hospitality Industry:  यह पहल कोविड -19 महामारी से जोखिमों को दूर करने के लिए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के  “आत्मनिर्भर भारत अभियान” के आह्वान के साथ जुड़ा हुआ है।] के साथ संयुक्त रूप से किए गए एक अध्ययन के अनुसार- 76% नर्सें काम के अत्याधिक बोझ की समस्या से ग्रसित  हैं।

यदि कोरोना काल में इन महिला स्वास्थ्य कर्मियों की स्थितियों का आकलन करेंगे तो हम पाते हैं कि उनकी स्थितियाँ अत्यंत चिंताजनक हैं। उदाहऱणार्थ -उनकी अबतक कोविड की पहली लहर में 8 महीने में 62 और दूसरी लहर में 3 महीने में 62 मौतें हुईं।

इसी संदर्भ में, यदि पूरे महाराष्ट्र राज्य की महिला स्वास्थ्यकर्मियों की स्थितियों का विश्लेषण करते हैं तो हम पाते हैं –  वहाँ कम से कम 570 आशा कार्यकर्ता COVID-19 से संक्रमित हुई हैं। ज्ञातव्य है कि इन आशा कार्यकर्ताओं को कम वेतन का  कम भुगतान किया जाता है, लेकिन बदले में इनसे अधिक काम लिया जाता है। साथ ही, उन्हें अपनी सेवा के क्रम में विशेषकर “घर-घर सर्वेक्षण के दौरान”  सामान्य जनता द्वारा कई प्रकार शारीरिक शोषण या हिंसा का भी सामना करना पड़ा है।

यह निंदनीय ही है कि इस संदर्भ में, आशा कार्यकर्ताओं के लिए सरकार की ओर से कोई उचित व्यवस्था नहीं है। यह सरकारी अकर्मण्यता एवं नीतिगत दुर्बलता का ही परिणाम है कि अबतक आशा कार्यकर्ताओं को सही मायने में उनकी  “सेवा-संबंधी कर्तव्यों” की उचित जानकारी उपलब्ध नहीं करायी गयी है। ज्ञातव्य है कि वे ही स्वास्थ्यकर्मियों की ऐसी विशिष्ट वर्ग हैं जिनपर देश की महिलाओं एवं शिशुओं के स्वास्थ्य संबंधी देखरेख की प्रत्यक्ष जिम्मेवारियाँ हैं क्योंकि उनके कर्तव्यों में प्रसवपूर्व और प्रसवोत्तर देखभाल, बच्चों के लिए टीकाकरण अभियान, रोग-आधारित निगरानी के लिए जनसंख्या-आधारित जांच इत्यादि शामिल हैं।

अतःमहिला स्वास्थ्यकर्मियों की दयनीय स्थितियों में सुधार करने की जरूरत है। इस संदर्भ में  निम्नांकित बिंदुओं पर ध्यान दिए जाने की जरुरत हैं :

  • काम करने की स्थितियां,
  • हिंसा,
  • उत्पीड़न
  • डर एवं
  • काम के बोझ का बना रहना।

भारतीय चिकित्सक संघ (Indian Medical Association) के अनुसार- दूसरी लहर में COVID-19 के कारण पिछले साल 624 डॉक्टरों बनाम 748 डॉक्टरों की मौत हो गई।

संक्षेप में, डॉ स्वाति राणे ने यह कहते हुए अपनी बात को समाप्त किया कि “हमें सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल की दिशा में निवेश करने की आवश्यकता है क्योंकि यह प्रयास ही निजी क्षेत्र की मुनाफाखोरी को रोकने के लिए कारगर साधन है ।”

इसके अलावे,  महामारी विज्ञानियों/महामारीविद् (Epidemiologists), नर्सों, वास्तुकारों (Architects), इंजीनियरों की तरह विविध नेतृत्व भूमिकाओं को सृजित करने की आवश्यकता है क्योंकि भारत विभिन्न आवश्यकताओं वाला एक विविध देश है।

अतः वर्तमान भारतीय स्वास्थ्य क्षेत्र में एक उत्तम एवं बेहतर स्वास्थ्य के लिए विभिन्न प्रभावी कारकों की आवश्यकता हैं, जैसे कि –

१. स्वास्थ्य कर्मियों के काम करने की स्थिति को गहराई से देखने की जरूरत है।

२. टेली-मेडिसिन को अपनाया जाना चाहिए।

३. दवाओं की कीमत को बनाए रखने की जरूरत है।

स्वास्थ्य भोजन, स्वच्छता और पानी से भी जुड़ा होना चाहिए- डॉ स्वाति राणे

अतः इसके लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को मजबूत करना होगा। साथ ही, स्वास्थ्य क्षेत्र में सार्थक बदलाव की भी जरूरत है।

स्वीकृति: प्रियंका, चिन्मय विश्वविद्यापीठ, कोच्चि (केरल), एमए (पीपीजी) कोर्स I IMPRI में एक शोध प्रशिक्षु भी I

COVID-19 महामारी की भयावह दूसरी लहर के लैंगिक प्रभाव के लिए YouTube वीडियो: भारत में तीसरी लहर का मुकाबला करने की दिशा में आगे का रास्ता

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