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रूरल रियलिटीज़ | मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ भारतीय गांवों में दूसरी लहर से निपटने में अभ्यासी’ के ग्रामीण वास्तविकताएं अनुभव

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इम्प्री टीम

यह पैनल चर्चा विशेषकर  भारतीय गाँवों में कोविड की दूसरी लहर के मद्देनज़र विभिन्न पेशेवरों के कार्य करने के अनुभवों से संबद्ध था, जो की “प्रभाव एवं नीति अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली” के सेंटर फॉर हैबिटेट, अर्बन एंड रीजनल स्ट्डिज (CHURS) एवं झाँसी(उत्तर प्रदेश राज्य) के “परमार्थ सेवी संस्था”  के संयुक्त प्रयासों द्वारा 20 मई , 2021 को आयोजित की गयी। यह चर्चा संस्थान द्वारा  देश के सम्पूर्ण राज्यों के लिए आयोजित की जा रही “पैनल चर्चा” की एक अन्य कड़ी ही थी, जिसके केन्द्रीय बिन्दु – मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्यों की ग्रामीण वास्तविकता एवं उससे संबंधित  मुद्दे रहें ।

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इस कार्यक्रम की शुरुआत “प्रभाव एवं नीति अनुसंधान संस्थान” की रीतिका गुप्ता( सहायक निदेशिका)  ने किया। साथ ही, डॉ सिमी मेहता(मुख्‍य कार्यपालक अधिकारी व संपादकीय  निदेशिका,  प्रभाव एवं नीति अनुसंधान संस्थान ) ने इस पैनल चर्चा की पृष्ठभूमि तैयार करते हुए सभी आगंतुकों का स्वागत करते हुए बताया कि इस का लक्ष्य एक उचित विचार- विमर्श प्रस्तुत कर यह पता लगाना है कि वर्तमान में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्यों में कोविड की दूसरी लहर की वस्तु- स्थिति क्या है  एवं इस संबंध में विभिन्न हितधारकों द्वारा जमीनी स्तर पर क्या प्रयास किए जा रहे हैं?

इस पैनल चर्चा में मुख्य तौर पर शामिल हुए प्रख्यात एवं गणमान्य पैनलिस्ट की सूची इस प्रकार है- डॉ श्रीमती के. एफ. काज़मी (कार्यकारी निदेशक, गैर सरकारी संगठन “परवरिश बाल विकास और स्वास्थ्य देखभाल संस्थान”), डॉ संजय सिंह (बुंदेलखंड के वाटरमैन, सचिव, परमार्थ समाज सेवी संस्थान),  डॉ योगेश कुमार (संस्थापक सदस्य और कार्यकारी निदेशक, समर्थन – विकास सहायता केंद्र), श्री देवी दास (किसान एमजी,समर्थन),  सुश्री आभा शर्मा (निदेशक, जुडाव फाउंडेशन, भोपाल), श्री भूपेश तिवारी (अध्यक्ष, साथी समाज सेवी संस्था, छत्तीसगढ़)

श्री ऋषि मिश्रा (राज्य समन्वयक (मध्य प्रदेश), इंडो-ग्लोबल सोशल सर्विस सोसाइटी),  श्री बाल परितोष दास (सामाजिक सुरक्षा, यूनिसेफ, छत्तीसगढ़),  डॉ गजेंद्र सिंह (स्वास्थ्य अधिकारी, यूनिसेफ, छत्तीसगढ़), श्री श्यामसुंदर यादव (लोक शक्ति समिति, छत्तीसगढ़), श्री राकेश पालीवाल (सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य आयकर आयुक्त, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़) एवं चर्चाकार की  भूमिका में श्रीमती अंजलि नोरोन्हा (अध्येता( Fellow),एकलव्य) तथा डॉ अंशुमान करोली (लीड – स्थानीय शासन, प्रिया,(PRIA) नई दिल्ली) आदि थें ।

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इस पैनल चर्चा की शुरुआत करते हुए, डॉ संजय सिंह (बुंदेलखंड के वाटरमैन, सचिव, परमार्थ समाज सेवी संस्थान) ने सर्वप्रथम  सभी आंगतुंकों  को धन्यवाद दिया कि उन्होंने इस विचार-विमर्श हेतु अपना विकट  समय निकाला।  आगे उन्होंने राष्ट्रीय  पटल पर मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ – राज्यों की महत्वपूर्ण भूमिका का परिचय देने के क्रम में, मध्य प्रदेश को देश की हृदयस्थली स्वीकारते हुए इसके भौगलिक संरचना एवं नृजातियता आदि का वर्णन किया।

ज्ञातव्य है कि मध्य प्रदेश की एक बड़ी सीमा  महाराष्ट्र राज्य से जुड़ती है,  यह राज्य सतपुड़ा तथा नर्मदा नदी घाटी के वन सघनता के साथ जैव विविधता लिए हुए है। इसके अलावे, यह राज्य प्रमुखत : एक आदिवासी बाहुल्य इलाका है, जो कि  समाज के अति निर्धनतम वर्गों की जनसंख्या का निवास- स्थान भी है।  साथ ही, इस क्षेत्र में प्रवासी श्रमिकों की पुरानी परंपरा रही है, विशेषकर छत्तीसगढ़ राज्य के “बिलासपुरी” मजदूरों की व्यथा-कथा सर्वविदित है।

आगे, डॉ संजय सिंह ने इसी विषय पर उत्तर प्रदेश राज्य के संदर्भ में पिछली दिन(१९ मई, २०२१)  ही संपन्न हुए चर्चा  की  सफलता व  प्राप्त संस्तुतियों की तर्ज़ पर आज की चर्चा हेतु व्यवहार्य संस्तुतियों की अपेक्षा की। साथ ही, उन्होंने राज्य के ग्वालियर , चंबल  आदि क्षेत्रों के अपने निजी कार्य-अनुभवों को साझा करते हुए इन संस्तुतियों द्वारा कोविड की दूसरी लहर की स्थिति में आगामी  १५ दिनों में सुधार  की परिकल्पना करते हुए कहा कि इनसे विशेषकर कृषक वर्ग को लाभ मिलेगा, क्योंकि राज्य में बारिश का मौसम भी निकट ही है।

इसी आशा और विश्वास के साथ, डॉ सिंह ने अपने शुरुआती व्याख्या के तत्पश्चात, विराम लेते हुए पुन : अन्य पैनेलिस्ट व चर्चाकारों को कोटि-कोटि धन्यवाद देते हुए चर्चा हेतु आमंत्रित किया।

 चर्चा के अगले क्रम में, ‘प्रभाव एवं नीति अनुसंधान संस्थान’ की टीम की ही सदस्या “सुश्री रामिया  कैथल एवं सुश्री महिमा कपूर” ने क्रमश : छत्तीसगढ़ तथा मध्य प्रदेश राज्यों में व्याप्त कोविड-19 के दूसरी लहर तथा संक्रमण दर, स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता, टीकाकारण की चुनौतियों एवं उससे संबन्धित अन्य मुद्दों आदि पर  एक संक्षिप्त प्रस्तुतिकरण के अंतर्गत इन दोनों राज्यों  के  संदर्भ में,  अद्यतन आँकड़ों सहित जनसांख्यिकीय , सामाजिक-आर्थिक आदि  सूचकों की मदद से एक तुलनात्मक अध्ययन साझा करते हुए, दोनों राज्यों  की जमीनी हक़ीकत से रूबरू कराया और इन राज्यों की स्वास्थ्यातम्क प्रगति तथा समृद्धि की कामना करते हुए एक सार्थक चर्चा हेतु सभी आगंतुकों अपने विचार रहने के लिए आमंत्रण दिया।

सामूहिक प्रयास

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सर्वप्रथम, सुश्री आभा शर्मा (निदेशक, जुडाव फाउंडेशन, भोपाल) ने प्रभाव एवं नीति अनुसंधान संस्थान की पूरी टीम को बधाई देते हुए अपने विचारों को साझा करते हुए कहा कि  हम लोगों ने कोविड  के प्रथम चरण व द्वितीय चरण के बीच के समय का सही आकलन करने में भारी  चूक कर दी, जिसका परिणाम यह हुआ कि  इस वैश्विक महामारी के संक्रमण के मामले  तथा  मौत के आँकड़ों में अचानक इजाफ़ा आया।

इसकी अन्य वजह यह भी रही कि हमने इस महामारी के प्रति शिथिलता का परिचय देते हुए कई प्रबंधन व नीतिगत निर्णयों को लेने में विलंब तथा अकर्मण्यता दिखायी। इसी संदर्भ में, राज्यों ने  स्वास्थ्य संकटों  की वास्तविकता और भयावहता की गणना सही तरीक़े  से न कर इस विभीषिका की चपेट में आकर एक बड़े पैमाने पर अपने राजकीय मानव- संसाधनों को खो दिया।

साथ ही, चिकित्सीय सुविधाओं के अभाव में स्वास्थ्य प्रबंधन का निम्नतम स्तर रहा, जैसे कि मेडिकल भवन है तो स्टाफ़ की अनुपलब्धता आदि।  इसके अलावे, राज्य के प्रत्येक परिवार में कोविड संक्रमित मामले  एक बड़ी संख्या में देखने को मिले, किन्तु सही सरकारी आँकड़ों के अभाव में  स्थितियां चुनौतीपूर्ण बन पड़ीं। इसी क्रम में, प्रवासी श्रमिकों एवं बेरोजग़ारों की भी उचित पता तथा संख्यात्मक प्रमाण न उपलब्ध होने के कारण राज्य की  सबसे ज़्यादा ३०-३५ आयु-वर्ग की युवा आबादी इस स्वास्थ्य-कुव्यवस्था का शिकार हो रही है, अतः इस दिशा में सामूहिक प्रयास की तत्काल जरूरत है।

आगे,  उन्होंने कहा कि वर्तमान में स्वास्थ्य आधारिक-संरचना एवं टीकाकरण  के प्रति  जागरूकता – ये दो ही चिन्ताएँ  हैं, जिनपर गंभीरता से काम करने की जरुरत है। 

टीकाकरण से जुड़ी  एक अन्य चुनौती की ओर ध्यानाकर्षित करते हुए उन्होंने साझा किया कि यह वैक्सिनेशन की यह प्रक्रिया का अनुचित इस्तेमाल किया जा रहा। इसका उदाहरण देते हुए कहा कि गाँवों में लोगों को पंजीकरण संबंधी  कठिनाई और अनभिज्ञता ने शहर के लोगों को ग्रामीणों के लिए निर्धारित किये गए टीकाकरण – केंद्रों पर अभिगम्यता उपलब्ध कराकर ग्रामीणों के स्वास्थ्य-अधिकारों का हनन किया है।  साथ ही, उन स्वास्थ्य- केंद्रों पर जब इस मामले में पूछताछ की गयी तो मेडिकल स्टाफों ने एक अन्य ही रहस्योद्घाटन करते हुए कहा कि टीकाकरण को लेकर अब भी ग्रामीणों में अनिच्छुकता का प्रचलन है।  अतः इस समस्या को सम्बोधित कैसे करें -यह गंभीर प्रश्न है।

अंत में , सुश्री शर्मा ने अपनी संस्था ” जुडाव फाउंडेशन” एवं अन्य स्वैच्छिक संगठनों के सहयोग द्वारा राज्य में किये जा रहे कोविड राहत कार्यों (पिछले ३ महीनों के दौरान २०,००० N5 मास्कों का वितरण,अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं आदि को सुरक्षात्मक उपायों के प्रति जागरूक करना आदि ) एवं अन्य प्रयासों (टीम द्वारा मध्य प्रदेश के बस्तर के क्षेत्रों तथा राजस्थान के उदयपुर के सुदूरतम ब्लॉक में टीकाकरण के प्रति ग्रामीण जनता में विश्वास बहाली का कार्य, राशन के किट उपलब्ध कराना तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर मेडिकल सुविधाओं- ऑक्सीजन की उपलब्धता सुनिश्चित कराना  आदि)  एवं निजी अनुभवों(मध्य प्रदेश के छत्तरपुर जिले में  उन्हें कैसे डॉ श्रीधर की चिकित्सीय मदद प्राप्त हुई)  को साझा किया।

साथ ही उन्होंने, टीकाकरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दिशा में ग्रामीण समुदाय के धार्मिक गुरुओं तथा पटवारी(पटवारी या लेखपाल राजस्व विभाग में ग्राम लेवल का अधिकारी होता है।) आदि को विकेन्द्रीकृत व्यवस्था पर आधृत पहल करने का सुझाव दिया।  इसके साथ, कोविड  की आने वाली तीसरी लहर के ज़ोखिमता  को ध्यान में रखते हुए, डॉक्टरों के भी चिंतित होने का हवाला देते हुए  राज्य के बच्चों के प्रति सतर्क रहने की आवश्यकता दर्शायी।

व्यवहार परिवर्तन

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आगे, डॉ योगेश कुमार (संस्थापक सदस्य और कार्यकारी निदेशक, समर्थन – विकास सहायता केंद्र) ने राज्य में कोविड महामारी की दूसरे चरण से सम्बद्ध पहलूओं व बुनियादी समस्याओं को साझा करते हुए अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि ज्ञात्वय है कि  मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ दोनों राज्य में बड़ी संख्या में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति(आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र ) आबादी का ही वास है तथा ये हमेशा से सामान्य विकास के क्रम में  पीछे ही रहें हैं, इस दृष्टिकोण से भी यह  वैश्विक विपदा स्थानीय स्तर पर आक्षेप ही प्रतीत होती है। इस संदर्भ में,  ग्रामीण महिलाओं की स्थिति तो और भी नाजुक़ है क्योंकि उनके समक्ष स्वास्थ्य व कुपोषण की भी समस्या पूर्व से  ही विद्यमान है।

इसके अलावे, कोविद  के मद्देनज़र ग्रामीण क्षेत्रों में वैश्वासिक संरचना का सर्वथा अभाव है, जिसके कारण स्वयं -सेवी संगठनों को लोगों को बेसिक व उपयोगी सहायता मुहैया कराने  के ही क्रम में  जमीनी स्तर पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। साथ ही, राज्यों के ग्रामीण  इलाकों  में होम- आइसोलेशन की सुविधा एवं इससे संबंधित प्रोटोकॉल  का पर्याप्त  व उचित साधनों  के आभाव गंभीरता पूर्वक सही तरीके से पालन नहीं किया जा रहा जिससे इस आपदा ने विकराल रूप धारण किया, अतः  यह स्वास्थ्यकर्मियों के लिए भी समस्याग्रस्त विषय बन रहा है।

इसके अलावे, डॉ कुमार ने बताया कि  राज्य में बहुत सारे ऐसे मामले भी उजागर हुए हैं जहाँ एकमात्र कमाने वाले ही सदस्य की मृत्यु हो गयी है और इससे  पूरे परिवार पर आर्थिक संकट के साथ भोजन एवं भूख  की समस्या उत्पन्न हुई है, परिणामस्वरूप निर्धनता की स्थिति भी बन पड़ी है। इस आपदा की घड़ी में, स्वैच्छिक संगठनों की भी भूमिका विशेष तौर पर नज़र आयी है – इनका सामुदायिक स्तर पर काम करना तथा ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य  केंद्रों तथा सरकारी अस्पतालों आदि में मेडिकल व

 अन्य व्यक्तिगत  सहायता पहुँचाकर नागरिक संगठनों आदि के कर्मठता की दिशा में एक सुखद तस्वीर प्रस्तुत की है। साथ ही, उन्होंने कहा कि  इस परिसंकटमय काल में, ऐसे संगठनों को राज्य सरकारों, स्वास्थ्य विभागों आदि  के साथ मिलकर पंचायत तथा स्थानीय स्तर पर प्रतिबद्धता का परिचय देते हुए काम करने की जरुरत है।

कोविड की इस दूसरी लहर को ध्यान देते हुए ,सभी नागरिकों को  अपने दैनिक व सामान्य जीवन में व्यवहार परिवर्तन करते हुए  कोविड  सबंधी  उचित व्यवहार जैसे कि मास्क लगाना, सामाजिक दूरी  बनाये रखना आदि सरकारी दिशानिर्देशों का स्वेच्छापूर्ण पालन किये जाने की जरुरत है। साथ ही, ग्रामीणों के समक्ष कोविड सन्निहित कई मुद्दे- जिला स्तर तक भी चिकित्सा सुविधा (एम्बुलेंस की अनुपलब्धता आदि ) का न मिलना, किसानों की (खरीफ़ फ़सल संबंधी, बीज़ आदि की चिंताएँ )समस्या, कोविड से  पीड़ित (मृतक सदस्य के अलावा जीविकोपार्जन हेतु किसी का न होना ) परिवार की आर्थिक समस्या  , ग्रामीण स्तर पर श्रमिकों की मनरेगा और नक़द आय के प्रति चिंताएँ आदि प्रमुखता से विराजमान हैं।

सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा

चर्चा में आगे बढ़ते हुए, श्री देवी दास (किसान एमजी,समर्थन) ने छत्तीसगढ़ राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में कोविड  संक्रमण के फैलाव का ज़िक्र करते हुए कहा कि  लोगों ने इस वैश्विक महामारी को “मौसमी बीमारी” मानते रहे और इसकी चपेट में आते चले गए।  इन क्षेत्रों में मुख्य तौर पर इतने तेज़ी के प्रसार का अन्य पहलू यह भी रहा कि चूँकि यहाँ समुदाय आधारित समाज है जिनसे हर व्यक्ति का ताना -बाना है, फिर चाहे वो गाँव में उठने-बैठने के सार्वजनिक स्थान(तालाब)  या पेय जल व्यवस्था से जुड़े संसाधनों  की बात हो, लोगों में सामजिक दूरी के व्यवहार के अवसर कम ही रहे, जो कि कोविड रोकथाम में एक अत्यंत जरुरी उपाय और सरकारी दिशा- निर्देश भी है।

इसके अलावे, संक्रमण को रोकने के लिए प्रबंधन के क्रम में सूक्ष्म  स्तर पर कार्यान्वयन की आवश्यकता है। साथ ही, उन्होंने एक निजी अनुभव को साझा करते हुए प्रवासी  श्रमिकों के अपने राज्यों में लौटने और उन्हें क्वारंटाइन करने की चुनौती का उल्लेख किया।  कोविड की इस दूसरी लहर से अघातित श्रमिकों को अपने राज्यों में लौटने के साथ ही  बारिश के मौसम को ध्यान में रहते हुए फ़सल लगाने के लिए क्वारंटाइन प्रोटोकॉल में लापरवाही बरती गयी , जिससे ये मामले ग्रामीण इलाकों में बेक़ाबू बन पड़ें। 

इस लहर की सबसे बड़ी मार, राज्य के महिला  घरेलू कामगारों (रायपुर के आस – पास के ५० शहरों में कार्यरत महिलाएँ  )पर भी देखने को मिली, उनका काम छूटा , जिसका सीधा असर उनके बच्चों के जीवन में भी रहा, वे भी घूम-घूमकर काम की तलाश में भटकते रहें।अतः इस दिशा में भी ऐसे वर्गों की सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित किये जाना एक कारगर कदम सिद्ध होगा।

स्पष्ट रणनीति

श्री पंकज पांडेय ने मध्य प्रदेश के संदर्भ में , कोविड की इस दूसरी लहर की विभीषिकता का आँकड़ों सहित विवरण देते हुए अपने अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि वे अपनी संस्था “समर्थन” के माध्यम से राज्य  के जनजातीय क्षेत्रों के लगभग १३ जिलों में अभ्यासरत हैं। संस्था के  सर्वेक्षण  के दौरान, उन्होंने विशेषकर १२ जिलों के २१ ब्लॉक के परिवारों का चयन किया , साथ ही बताया कि वे १३ जिलों में से ९ जिलों को पूरी तरह से अपने सर्वे में शामिल किया।  इसके अलावे, उन्होंने दूसरी लहर का इन क्षेत्रों में प्रचंड स्वरुप धारण करने के पीछे यहाँ शिक्षा व जागरूकता का निम्नतम स्तर बतलाया। 

आगे इस क्षेत्र के कोविड संक्रमण के मामलों के पॉजिटिव दर और खासकर मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के अध्ययन के मामले साझा किया, जिसके अंतर्गत- सरकारी आँकड़ों और वास्तविक आँकड़ों का  एक अलग ही नज़रिया मिला (८ मई , २०२१ तक किये सर्वे में, बड़वानी जिले के १२ जिलों के लगभग ३९७८५ परिवारों के केस -स्टडी के दौरान पाया गया कि एक ब्लॉक के ९६ गाँवों के कुल २८६८ मामलों में से २८७ की मौतें हुई , जिसे सरकारी रिकॉर्ड के हिसाब से ३५ लोगों के नाम पर दर्ज़ किया गया और केवल ११ लोगों के ही पक्ष में  मृत्यु -प्रमाण पत्र निर्गत किये गए। ) , ऐसी स्थितियाँ न केवल भ्रामक है, अपितु इस आपदा को सही तरीके से काबू पाने की दिशा में भी चुनौतीपूर्ण हैं। 

आगे, उन्होंने सरकारी कार्यप्रणाली की निंदा करते हुए ग्रामीण क्षेत्रों की  एएनएम, आशा वर्कर्स  एवं आँगनवाड़ी कर्मियों  द्वारा किये जा रहे कोविड -सर्वे के दौरान  बेसिक मेडिकल किट  व उपकरणों  जैसे कि ऑक्सीमीटर तथा थर्मामीटर आदि की पर्याप्त आपूर्ति न किये जाने को भी कोविड के सही आंकड़ें पाने की दिशा में बाधक माना।  उनकी शिकायत भी रही है कि उन्हें खुद के एहतियात के लिए शहरी नर्सों की अपेक्षा कम टिकाऊ मेडिकल किट मिल रहे हैं। साथ ही, इन महिला स्वास्थ्य कर्मियों को अपने परिवारिक तथा घरेलू जिम्मेदारियों को उठाते हुए दोहरी भूमिका अदा करना होता, इस कारण भी उनके द्वारा घर-घर कोविड  संबंधी जाँच-परीक्षण का सही और ध्यान से किया जाना संशयपूर्ण ही प्रतीत(सक्रिय जांच पर असमंजस की स्थिति) होता है। 

अंत में, श्री पंकज पांडेय ने  सुझावात्मक पहलूओं की चर्चा करते हुए अपने संस्था के लगभग २०-२२ हजार युवा स्वयंसेवकों जो कि पिछले ४ साल से जुड़ें हैं , उनके प्रयासों की इस आपदा में साथ देने की भी जानकरी दीं।  आगे, सरकार के संदर्भ में कहा कि एक सर्वे के माध्यम से राज्य में चल रही सामाजिक- आर्थिक सुरक्षा की विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत (७ तरह की  कौशल विकास की योजना, सबल योजना, राष्ट्रीय परिवार सहायता योजना(राष्ट्रीय परिवार सहायता योजनांतर्गत गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवार के ऐसे मुखिया स्त्री या पुरूष जिनकी आमदनी से परिवार का अधिकांश खर्च चलता है तथा जिसकी आयु 18 वर्ष से अधिक 65 वर्ष से कम हो प्राकृतिक/आकस्मिक मृत्यु हो जाने पर परिवार के वारिस मुखिया को रूपये 10,000/- की एक मुक्त सहायता प्रदान की जाती है।)

अथवा  ९० दिन में एटीएम से पैसे निकालने वाले व्यक्ति आदि लाभुकों के लिए ही ) दस्तावेज़ीकरण कर ग्रामीण लाभार्थियों को स्पष्ट रणनीति के तहत न्यूनतम आर्थिक राशि देकर उनके जीवन को यथेष्ट दिशा दिए जाने की पहल करने के क्रम में, नागरिक सेवा संगठनों से भी सहयोग लेते हुए इनकी समस्याओं को सही मायने में सम्बोधित करना ही प्राथमिकता होनी चाहिए।  

सिविल सोसाइटी

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वहीं , डॉ गजेंद्र सिंह (स्वास्थ्य अधिकारी, यूनिसेफ, छत्तीसगढ़) ने कोविड की इस चरण के बारे में एक अलग विचार साझा करते हुए कहा कि यद्यपि यह वायरस पिछले साल से था , परन्तु तब हमें इतने मामले नहीं देखने को नहीं मिले, इसका एक कारण यह भी माना जा रहा है कि इस वक़्त देश में चल रहे , कोविड – परीक्षण के सरकारी प्रयत्नों में तेजी ने भी संक्रमण के आँकड़ों में आनुपातिक वृद्धि दर्ज़ करायी,  फलत: कोविड के मौत के मामले भी बढ़ते गए। 

साथ ही, राज्य सरकारों से भी इस वैश्विक महामारी की प्रकृति को समझने में चूक हुई, उन्होंने इसकी गंभीर परिणामों का पूर्वानुमान न करते हुए लॉकडाउन को ताक पर रख आम-जनजीवन को खुली छूट देकर तथा टीकाकरण की दिशा में पीछे(अभी देश की युवा आबादी की तुलना में विशेषकर  ४५ वर्ष  या उससे ऊपर के , ६० वर्ष या उससे ऊपर के आयु वर्ग की जनता इस लहर की चपेट में हैं ) रहते हुए- कोविड के तांडव हेतु  स्वयं ही निमंत्रित दिया। 

इसके अलावे, उन्होंने ग्रामीणों की इस महामारी के प्रति अंदेशापूर्ण व्यवहारों ने भी चुनौती खड़ी कर दी।  भारत सरकार के वर्तमान जानकारियों के अनुसार छत्तीसगढ़ , मध्य प्रदेश के इंदौर आदि स्थानों में कोविड मामले घटे हैं। इस दिशा में एक चुनौती यह भी है कि नीति- निर्माण एवं आंकड़ों के संग्रहण की दिशा में किन आधारों पर ग्रामीण एवं नगरी क्षेत्रों का चयन व वर्गीकरण किया जाता है(क्षेत्रों के निर्धारण के कारण भी आँकड़ों में परिवर्तन की भ्रामक स्थितियां बनती हैं ) । 

अतः इन निर्धारण सम्बद्ध दुर्बलताओं से निजात पाने के लिए सिविल सोसाइटी को भी राज्य  सरकार के साथ जिम्मेदारियों का वहन करते हुए सही आँकड़ों को उपलब्ध कराना नितांत युक्ति ही है। साथ ही उन्होंने जोर देते हुए कहा कि  इस चरण में  ग्राम स्तर पर निगरानी, जाँच , आइसोलेशन एवं परामर्श आदि पहलूओं पर ध्यान देना होगा। है।साथ ही, इस लहर को ध्यान में रखते हुए L1 एवं L2 के अंतर्गत उचित चिकित्सीय पहल को सही मायनों में जमीन पर उतारने  की जरूरत है। संक्रमण के लक्षणों को किसी भी तरह से नज़रअंदाज़ न करते हुए टेस्टिंग कराना अनिवार्य कदम है, साथ ही ऐसे कोरोना वाहकों की पहचान और पता लगाने की जरुरत है, जो टेस्टिंग व लक्षणों के प्रति जागरूकता नहीं दिखाते हुए अपना कर्तव्य नहीं निभा रहें।

इसके अलावे, डॉ सिंह ने भारत सरकार के उसी दिन के कोविड के आगामी योजनाओं  की प्रेस ब्रीफिंग के मुख्य बिंदुओं पर जानकारी साझा किया।  ग्रामीण तथा जिला  स्तर पर चौबीसों घंटों कोविड नियंत्रण कक्ष  एवं प्रभावी तंत्र के कार्यान्वयन की दिशा में आगे आना भी शामिल है। इसके अतिरिक्त गाँवों के स्तर पर ऑक्सीमीटर, थर्मामीटर आदि पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराकर ग्रामीणों में कोविड के लक्षणों में जरा भी देरी नहीं बरतनी होगी, इसके लिए जन- आंदोलन एवं स्वयं सेवकों की ही भूमिका अपरिहार्य बन पड़ती है। ग्रामीण स्तर पर केवल दो तरीकों से टेस्टिंग की अवधारणा पर काम किया जा सकता है – प्रत्येक १० गाँवों  के लिए एक मोबाइल टेस्टिंग- वैन की उपलब्धता तथा टेस्टिंग में तेज़ी लेन के क्रम में, रैपिड एंटीजन टेस्ट जैसे परीक्षण का तरीका अपनाना होगा। 

साथ ही, सभी प्राथमिक , सामुदायिक स्वास्थ्य एवं उपकेंद्रों पर कोविड की परीक्षण की उचित व्यवस्था ,अन्य मेडिकल सुविधाओं सहित  जन -औषधि केंद्रों में भी पर्याप्त मात्रा में दवाएँ एवं आदि उपलब्ध कराने की दिशा में काम करना जरुरी है।इसके लिए समुदायों को संगठित करते हुए जमीनी स्तर पर सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर भविष्यवर्ती  कार्ययोजना की महती  आवश्यकता है, अंत में उन्होंने यूनिसेफ के प्रयासों का भी  हवाला दिया।

सरकारी संस्थाओं की भूमिका

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इस चर्चा में , श्री बाल परितोष दास (सामाजिक सुरक्षा, यूनिसेफ, छत्तीसगढ़) ने संयुक्त राष्ट्र बाल कोष  की कार्यप्रणाली का व्यापक ज़िक्र  करते हुए अपने विचार कोविड के दूसरे लहर से उत्पन्न समस्याओं के निदान संबंधी संस्थागत पहलों की जानकारी साझा की।  उन्होंने बताया कि  कैसे इस चरण ने स्वास्थ्य व्यवस्था के हानिकारक तरीके से प्रभावित करते हुए मूल्यांकन एवं प्रतिक्रिया पहलूओं  के समक्ष भी चुनौती पैदा कर दी। इस वैश्विक महामारी ने न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था को हानि पहुँचायी, बल्कि सामजिक- आर्थिक व्यवस्था एवं बच्चों सहित ग्रामीण विकास  के लगभग सभी संकेतकों पर विध्वंसकारक प्रभाव छोड़ें।

बहु -आयामी निर्धनता के संदर्भ में दोनों राज्यों -मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में नगरीय क्षेत्रों की तुलना में   क्रमशः ४४ % तथा १२% के परिणाम देखने को मिलें।  साथ ही, इस दौरान स्वास्थ्य , पोषण, जलापूर्ति , स्वच्छता, बाल संरक्षण एवं बाल -विवाह आदि सभी संकेतक बुरी तरह से बेहाल रहें। छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर ज़िले में भी (जो कि एक ऑपेऱशनल  जिला है) कोविड  तथा व्यापक लॉकडाउन  के कारण भेद्यता(Vulnerability)  की दर  अधिक रही।

आगे, श्री  दास ने मुख्य रूप से  दो तरह के प्रभावों का वर्णन किया- १.राज्यों में  कई बार में लगाए गए ,सामूहिक लॉकडाउनों  ने जीविकोपार्जन को काफ़ी  नजदीक व महत्वपूर्ण तौर पर असर डाला।  २. इस महामारी के इस चरण में  राज्य भर के बच्चों एवं अनाथ बच्चों की समस्या तथा  जन-क्षति के उदाहरण मिलें, किन्तु पिछले चरण के माफ़िक  राज्यों की सीमा पार करते हुए  प्रवासी श्रमिकों की बेहाली देखने को नहीं मिली। पर इस बार, उनके समक्ष खेती  के मौसम में अपने निवास-क्षेत्रों की वापसी पर भोजन-उत्पादन आदि की समस्या हावी रही। साथ ही, राज्यों में बच्चों एवं महिलाओं आदि के मुद्दों पर आमने -सामने साक्षात्कार न होने के कारण परिस्थितियों का सही आकलन नहीं हो पा रहा।

अतः उपरोक्त वर्णित प्रभावों के संदर्भ में श्री दास  ने त्वरित समाधान हेतु सभी सिविल सोसाइटी एवं ग़ैर -सरकारी संस्थाओं की भूमिका पर जोर देते हुए उनसे सहयोग की अपेक्षा जाहिर की। साथ ही, उन्होंने कोरोना काल में बच्चों की शिक्षा के बुरी तरह प्रभावित होने पर भी चिंता जताते हुए कहा कि यह उनके विकास को गंभीर तौर से गुमनामी की ओर ढ़केल रहा है। इसके अलावे,इस दौरान  ग्रामीण क्षेत्रों की गर्भवती महिलाओं की वर्तमान  स्थितियों जैसे कि  उनकी प्रसव पूर्व देखभाल एवं आयरन की कमी की समस्या आदि सेवाएँ भी स्थिर रहीं।

आगे, उन्होंने छत्तीसगढ़ राज्य के सामाजिक सुरक्षा व उन्नति आदि पहलूओं के दीर्घकालिक कार्यान्यवन की दिशा में विभिन्न सरकारी योजनाओं (छत्तीसगढ़ देशभर में मनरेगा के तहत रोजगार उपलब्ध कराने  में अव्वल राज्य , सार्वजनिक वितरण प्रणाली योजना, राजीव गांधी किसान न्याय योजना) आदि के संदर्भ में कई एनजीओ (बजट और नीति अध्ययन केंद्र (सीबीपीएस), बंगलौर, टाटा ट्रस्ट एवं संयुक्त राष्ट्र बाल कोष आदि )  के पारस्परिक सहयोग की जानकारी साझा करते हुए बताया कि ग्रामीण सामजिक, आर्थिक एवं उत्पादन आदि से संबद्ध पहलूओं के वास्तविक अवलोकन तथा समीक्षा के क्रम में यह जानना जरुरी है कि क्या ये सही तरीके से समाज के सीमांत वर्गों तक पहुंच रहा है या नहीं?

हालाँकि राज्य में मनरेगा और पीडीएस  के संदर्भ में अनंतिम स्तर पर अभी रिपोर्ट प्रकाशित नहीं है, जिसके कारण सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के आकलन में बाधा रही है, यहाँ के आदिवासी इलाकों में ज्यादा गंभीर समस्या रहती है।  वहीं ग्रामीण स्तर पर दिव्यांगजनों, वृद्धापेंशन  योजनाओं की पहुँच   २-३% ही है तथा मातृत्व सुरक्षा लाभ योजना की पहुँच थोड़ी ठीक है ,जो कि  ५०% से कम ही है।

अंत में , श्री बाल परितोष दास ने राज्य में संयुक्त राष्ट्र बाल कोष की टीम के प्रयासों का भी उल्लेख करते हुए कहा कि  हमारी टीम  स्वास्थ्य प्रतिक्रिया की दिशा में इस कोविड के दौरान अनाथ बच्चों एवं सीमांत वर्गों आदि के जीवन के  बेहतरी हेतु सहायता प्रदान करते हुए एक  हेल्पलाइन नंबर भी जारी किया है ताकि ग्रामीण समुदायों के बीच इस महामारी व टीकाकरण  की मिथकों  और वास्तविकताओं (टीकाकरण के लिए समझाने गए स्वास्थकर्मियों पर ग्रामीणों का हमला की  घटना का जिक्र  )  का स्पष्टीकरण किया जा सकें। साथ ही, सुझाव देते हुए कहा कि  खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक पहलू  पर पहुँच को कैसे बढ़ाया जाये- इसके लिए विभिन्न सिविल सोसाइटी तथा पंचायती राज संस्थाओं पर काम करने की दरकार है। 

इसी क्रम  में बताया कि वे लोग बस्तर क्षेत्र में पंचायती राज संस्था की महत्वपूर्ण भूमिका से जुड़े सभी सूचनाओं व  मुद्दों पर बातचीत कर रहे हैं।  साथ ही, सुरक्षा योजनाओं की सुधार के प्रति जागरूकता हेतु जन सहयोग की अपील करते हुए कहा कि  हम सब विभिन्न हितधारक समूह इस “समाज रूपी सागर में बस एक मोती की तरह है”, जिसका एकमात्र उद्देश्य -समाज की समृद्धि और संवर्धन करना ही  है। 

अतः  ग्रामीण स्तर पर एकजुट होकर करने की नितांत आवश्यकता है, साथ ही कहा कि महिलाओं तथा बच्चों को लेकर हुए एक  प्रभाव आकलन (Impact assessment: Mixed Telephonic interview ) के आधार पर यह पाया गया कि कोविड 19 की पहली लहर में  ग्रामीण निर्माता के रूप में महिलाएं ही रहीं। 

मानसिक स्वास्थ्य

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 अन्य चर्चाकार, श्री श्यामसुंदर यादव (लोक शक्ति समिति, छत्तीसगढ़) ने छत्तीसगढ़ राज्य की आर्थिक पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए अपनी विचारों का आगाज़ किया। उन्होंने  कहा कि  निःसंदेह राज्य में संसाधनों की प्रचुरता है (औद्योगिक एवं खनिज, ऊर्जा एवं इस्पात उद्योग आदि के मामले में देशभर में अलग पहचान ), किन्तु बहुत सारी  चुनौतियों सहित। कोविड  के दूसरी लहर के दौरान देखा गया कि  राज्य के शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों में किसी परिवार के एक सदस्य के संक्रमित होने से पूरा परिवार चपेट में आ गए, अतः इस दिशा में आँकड़ों के सही आकलन हेतु दो रूपों में ऐसे मामलों के विश्लेषण करने की जरुरत है- कोविड  के पूर्व एवं उसके पश्चात् की स्थिति का अवलोकन आदि।

साथ ही, कोविड पॉजिटिव होने तथा बाद -दोनों  स्थितियों  में क्रमश : उचित  टेस्टिंग तथा कोविड  संबंधी सुरक्षात्मक रोकथाम के उपायों को गंभीरता से अपनाये जाने की जरुरत है।  इसके अलावे, श्री यादव ने कोविड के दौरान  उत्पन्न हुए कई मुद्दों जैसे कि बच्चों एवं महिलाओं  की स्वच्छता की समस्या, मानसिक स्वास्थ्य तथा परामर्श की चुनौती , संक्रमित व्यक्ति की  टेस्टिंग तथा क्वारंटाइन आदि के प्रभावों का विवरण देते हुए कहा कि इन सबसे जल्द-से-जल्द निपटने के लिए शासकीय प्रकिया के अंतर्गत ग्रामीण अलगाव से सम्बद्ध सभी पहलूओं पर विभिन्न नागरिक संगठनों व हितधारक समूहों आदि  की शुद्ध कार्यशीलता (Networking ) के माध्यम से  मजबूती से काम करने की आवश्यकता है।

इसी संदर्भ में , उन्होंने ने इन ग्रामीण क्षेत्रों में राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (SRLM) के अंतर्गत महिला समूहों , समुदायों  एवं ग्राम पंचायत सहित  स्वयंसेवकों के सहयोग की अपील का सुझाव ( उदाहरण हेतु- 300 गांवों की कोविड स्क्रीनिंग का लक्ष्य अपनाते हुए संक्रमण की बढ़ती दर को कुछ हद तक निंयत्रित कर मानव क्षति से बचने का ) दिया और इस माहमारी की दूसरी लहर में  जिला प्रशासन के प्रयासों के संवेदनहीनता पर भी टिप्पणी की । 

अंत में, अपनी संस्था के प्रयासों की भी चर्चा करते हुए कहा कि होम- आइसोलेशन के प्रबंध, टीकाकरण के उचित परामर्श-सलाह, किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य में गिरावट आने की  स्थिति में अस्पताल में भर्ती  आदि कार्य किये जा रहे हैं। इसके अलावे, हमारी संस्था के माध्यम से राज्य भर में पंचायतों के साथ लगातार बातचीत चल रही है, साथ ही उन्होंने विभिन्न आदिवासी समुदायों एवं अन्य समुदायों के प्रमुखों को टीकाकरण हेतु ग्रामीण जनता को स्थानीय स्तर पर प्रोत्साहित करने की भी अपील की। 

श्री श्यामसुंदर यादव ने अपने वक्तव्य का समापन करते हुए छत्तीसगढ़ राज्य में मनरेगा की स्थिति के साथ ही ,इस वैश्विक आपदा से प्रताड़ित अनाथ बच्चों की दशा का वर्णन करते हुए उनके लिए राज्य की ओर से व्यापक तथा एक स्पष्ट रणनीति के तहत “कानूनी अभिभावक अथवा संरक्षक और पुनर्वास की व्यवस्था” को चुनौतीपूर्ण करार देते हुए सारगर्भित  प्रस्ताव रखें।  

भोजन, आश्रय एवं चिकित्सीय सेवा

आगे, श्री ऋषि मिश्रा (राज्य समन्वयक (मध्य प्रदेश), इंडो-ग्लोबल सोशल सर्विस सोसाइटी) ने कोविड  की वर्तमान लहर से जुड़े मुद्दों एवं उनके निराकरण के सुझाव के साथ अपने विचारों को एक प्रस्तुतीकरण के माध्यम से साझा किया।  उन्होंने कहा – कोविड-संक्रमण  के बढ़ते मामलों ने एक बार फिर उद्योगों तथा परिवहन साधनों  के  ठप पड़ जाने के परिणामस्वरूप रिवर्स माइग्रेशन की समस्या के साथ ग्रामीणों के समक्ष भोजन, आश्रय एवं चिकित्सीय सेवाओं एवं जीविकोपार्जन की समस्या  उत्पन्न हुई। साथ ही, कोविड के इस चरण में ग्रामीण व्यवस्था की बेहाली का वही स्वरुप दृष्टिगोचर हुआ , जिसका दंश पिछले वर्ष शहरी व्यवस्था ने भुगता था। 

 साथ ही, इस लहर में राज्यों के ग्रामीण स्तर पर कई चुनौतियां देखने को मिलीं-अनिर्णायक जानकारी, बढ़ी हुई अवैज्ञानिक प्रथाएं, अपर्याप्त जांच और दवा आदि का अभाव , खराब स्वास्थ्य ढांचा, पंचायती राज स्तर पर आपदा प्रबंधन योजना का अभाव आदि।  श्री मिश्रा ने कहा कि इस दूसरी लहर के दौरान , खासकर मध्य प्रदेश राज्य के   ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी कोई आपदा प्रबंधन नहीं थी।  इसके अलावे मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ – दोनों राज्यों में पंचायती स्तर पर भी कोई योजना या कोई समिति होना अपरिहार्य है ताकि उपरोक्त वर्णित  समस्याओं को स्थानीय स्तर पर संबोधित किया जा सकें।

आगे, उन्होंने अपने  संगठन   (इंडो-ग्लोबल सोशल सर्विस सोसाइटी) के बारे में जानकारी साझा करते हुए मध्य प्रदेश के झबुआ,अलीराजपुर, धार, पन्ना एवं छतरपुर आदि जिलों के लगभग  २१० गाँवों तक अपनी कार्य योजनाओं की  पहुँच बतायी।

साथ ही, यह भी कहा कि कैसे हम अपने टीम के माध्यम से कोविड संकट की से निपटने के क्रम में  कुछ चिन्हित  कार्ययोजनाओं को निर्धारित किया है, उदाहरण के लिए – युवा स्वयंसेवकों को सरकारी प्रतिक्रिया योजना(आर्थिक सबलता  के लिए नक़द समर्थन और नरेगा योजना आदि ) के लाभों का लाभ उठाने में परिवारों का समर्थन करने में सक्षम बनाना, सही सूचना प्रसार द्वारा कोविड उपयुक्त व्यवहार (सीएबी) की सूचना प्रसारण, टीकाकरण एवं जांच केंद्र सूचना, योजना लाभ सूचना आदि तैयारियों को साकार करना।

अन्य मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हमें ग्रामीण स्तर  पर पर सकारात्मक विचलन का दृष्टिकोण अपनाते हुए यह तय करने की आवश्यकता है कि  कैसे  कोविड की इस लहर का डटकर मुकाबला करते हुए  पारिवारिक चिंताओं और मनोविज्ञान परामर्श के पहलूओं का समाधान किया जाये। इसी संदर्भ में, उन्होंने कोविड – टीकाकरण के अतिरिक्त गर्भवती एवं स्तनपान कराने  वाली महिलाओं के पूर्व -प्रसव देखभाल एवं कम उम्र के  बच्चों का पूरक पोषण आदि तथ्यों पर ध्यानाकर्षण करते हुए अपनी बात समाप्त की।

शिक्षा एवं जागरूकता

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श्री भूपेश तिवारी(अध्यक्ष, साथी समाजसेवी संस्था, छत्तीसगढ़) ने कोविड  की वर्तमान स्थितियों के मद्देनज़र अपने संस्था के माध्यम से राज्य के बस्तर जिले के ग्रामीण समुदायों के बीच व्यतीत  निजी अनुभवों को साझा किया।  उन्होंने विशेषकर त्रिस्तरीय समस्याओं का जिक्र किया-

१. जमीनी स्तर की वास्तविक चुनौतियाँ ,

२. सामुदायिक स्तर पर शिक्षा एवं जागरूकता के मुद्दे तथा

३.  राज्य प्रशासनिक स्तर पर संकटप्रद परिस्थितियों के निपटान आदि।

ग्रामीण व्यवस्था के अंतर्गत, कई अन्य मुद्दों का उल्लेख करते हुए   प्रशासनिक अकर्मण्यता अथवा रवैए , गाँवों में होम-आइसोलेशन की बेसिक सुविधाओं का अभाव(अधिकांश घरों में अतिरिक्त  कमरे , शौचालय , स्नानघर एवं पानी की व्यवस्था का सर्वथा अभाव ) तथा प्रोटोकॉल का उचित व दृढ़ता से अनुपालन न होना आदि पर चिंता दर्शायी।

इसके अलावे, सरकार द्वारा ग्रामीण परिवारों का उचित मूल्यांकन न किया जाना, स्वास्थ्य केंद्रों की दीवारों पर केवल पोस्टर के माध्यम से दवाईयों के नामों  का प्रदर्शन मात्र किया जाना आदि  कुछ ऐसे मुद्दे रहे जिनकी वजह से कोविड  की समस्या विकट  बन पड़ीं। साथ ही, जनजातीय क्षेत्रों में स्वभावत: खाद्य -संग्रहण की प्रवृति न होने के कारण (इस समुदाय के लोग प्रकृति से जरूरत के हिसाब से चीजें हासिल करने में विश्वास करते हैं ) संक्रमण से पीड़ित होने पर भी खुद ही अपने परिवार के लिए सारे इंतेजामात करने आदतों ने कोविड  के मामलों को और बढ़ाया।

श्री तिवारी ने राज्य में होम-आइसोलेशन  की विफलता की जानकारी देते हुए इसकी निंदा की कि कैसे इस दिशा में प्रोटोकॉल का सख्ती से अनुपालन नहीं किये जाने से संक्रमण के मामलों में बेइंतेहा वृद्धि हुई है। इसी संदर्भ में, उन्होंने कहा कि लोगों को दवा देते हुए उचित निर्देश (मेडिकल-पर्चों का अंग्रेजी भाषा में लिखे होने से ग्रामीण  लोगों को दवा के लेने के तरीके आदि का ज्ञान नहीं है , अन्य मेडिकल उपकरणों(ऑक्सीमीटर , ऑक्सीजन -सिलेंडर आदि ) के उपयोग करने के सही जानकारी के  अभाव में )नहीं दिए जाने से यह समस्या गंभीर होती जा रही है।

अतः मृत्यु की रफ़्तार पर लगाम लगाने के क्रम में संस्थागत संगरोध केंद्रों (Institutional quarantine centres) पर ज्यादा बल देने की जरुरत है। साथ ही, ग्रामीण स्तर पर टेस्टिंग को  अधिकाधिक बढ़ावा देने  और टीकाकरण हेतु प्रेरित करते हुए समुदायों के भ्रांतियों या नासमझियों  ( ताकि यह केवल कुछ प्रेरक व्यक्तियों को है दोष न दिया जाये, जैसे कि किसी के सलाह पर टेस्टिंग या टीका लिया और वो संक्रमित पाया जाये, परिणामत: व्यक्ति-विशेष की जान चली जाये ) )को दूर करने की जरुरत है।

चूँकि हमारी राज्य सरकारें पहले से ही कर्तव्यों के बोझ से दबी पड़ी हैं , अत: यहाँ सिविल सोसाइटी के साथ मिलकर भ्रांतियों (नपुंसकता व  मृत्यु के आधार  पर एक आशा वर्कर को टीकाकरण के ड्यूटी के दौरान हिंसा का शिकार होना पड़ा एवं ग्रामीणों के विरोध का भी सामना करना पड़ा।  ) के संदर्भ में  स्थानीय  जागरूकता पर गंभीरता से  काम करना होगा ताकि जनता में इसके वास्तविक उद्देश्यों के प्रति  सही जानकारी पहुंचें।

सरकार द्वारा ग्रामीण स्तर पर स्वास्थ्य  व्यवस्था की दिशा में संसाधनों , मानव-संसाधनों की कमी, अन्य चिकित्सा सुविधाएं (ऑक्सीमीटर, सिर्फ जिले में ऑक्सीजन संकेन्द्रण की व्यवस्था ) आदि की उपलब्धता नहीं है। इसके अलावे, उन्होंने कहा कि  राज्यों ने पिछले साल की स्थितियों से भी अबतक कुछ सबक नहीं ली, साथ ही कुछ सरपंचों ने संस्थागत संगरोध केंद्रों से संबंधित  धनराशि तथा आर्थिक संसाधनों (१५-१७ दिन तक क्वारंटाइन सेंटर पर खाना, फल एवं दूध जैसी व्यवस्था करने के सम्बन्ध में) का पंचायत स्तर पर  भुगतान न किये  जाने की शिकायत भी की।

अंत में, श्री भूपेश तिवारी ने गाँव  में क्वारंटाइन सेंटरों पर सभी बेसिक सुविधाओं को उपलब्ध कराने की वकालत करते हुए यह भी विचार रखा कि  प्रत्येक जगह, क्षेत्रों आदि की  परिस्थितियां  एवं संसाधनों  में एकरूपता न होने के कारण (सामान्यीकरण हल संभव नहीं )  इन पर एक ही तरह की कार्ययोजनाओं का कार्यान्वयन नहीं किया जा सकता , अतः इस दिशा आमुख क्षेत्रों के उपलब्ध परिस्थितियों को देखते हुए निर्णय कर हल निकालना  होगा।

इसके साथ ही, सभी ग्रामीण स्तर पर यह भी सुनिश्चित करना आवश्यक है कि  सरकार की प्रशासनिक संरचना के प्रत्येक इकाईयों(पंचायत, जिला तथा जिले के स्तर पर ) के मध्य विभिन्न स्वयं सहायता समूहों, युवा संगठनों को मजबूत कर एक उचित समन्वय स्थापित किया जाये ताकि सही मायने में समुदायों को सहायता देकर इस संकट पर काबू पाया जा सकें।

अन्य गंभीर पहलू  के तहत , ग्रामीण व स्थानीय स्तर पर विशेषकर  बच्चों के पोषण एवं गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए बेसिक आवश्यकताओं को देखते हुए उनके टीकाकरण तथा मेडिकल परामर्श-सम्बन्धी मुद्दों पर नई पद्धतियों को अपनाने की जरुरत है।

साथ ही, उन्होंने अपनी संस्था के प्रशासन के साथ अबतक इस विपदा की घड़ी में मिलकर ५० लाख रूपये के राशन तथा  पीपीइ किट्स के निःशुल्क वितरण एवं अन्य योगदानों की जानकारी देते हुए सरकारी तंत्र द्वारा पंचायत स्तर पर सहयोग की भी अपेक्षा जाहिर की, ताकि वे पूरी तरह से इस महामारी में मजबूती से अग्रसर होकर ग्रामीणों को मदद प्रदान करें  ।

अपनी चर्चा का समापन करते हुए जिला प्रशासन से अनुरोध करते हुए कहा कि  बस्तर में  “होम -आइसोलेशन” को तो यथाशीघ्र बंद किया जाये क्योंकि यह पूरी तरह से असफल है। साथ ही, ग्रामीण स्तर पर  पोषण ट्रैकर के मामले में भी विरोधाभासी योजनाओं का जिक्र करते हुए, इसे भी कोविड रूपी  विपदा से लड़ने में एक असफल युक्ति ही बतायी। 

सरल व्यवहार

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साथ ही, डॉ श्रीमती के. एफ. काज़मी (कार्यकारी निदेशक, गैर सरकारी संगठन “परवरिश बाल विकास और स्वास्थ्य देखभाल संस्थान”) ने भी इस चर्चा में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराते  हुए कोरोना की इस दूसरी लहर को ध्यान रखते हुए सर्वप्रथम बच्चों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों को अपने अनुवभवों के आधार पर परिभाषित किया। डॉ काजमी जो कि एक बाल (रोग) चिकित्सक हैं, उन्होंने विशेष तौर पर अजात शिशु  एवं गर्भवती महिलाओं के टीकाकरण करने के विवादास्पद मुद्दे पर सरकारी निर्देशों के जारी किये जाने की बात साझा करते हुए कोविड की इस दूसरी लहर को बच्चों के संदर्भ में भी लक्षण दिखने के साथ ही गंभीरता से लेने को कहा।

इसके अतिरिक्त ने डॉ काज़मी ने ग्रामीण समाज एवं अन्य सीमांत वर्गों से जुड़े अपने कई अनुभवों के आधार पर (शहरी मलिन बस्तियों का सामुदायिक हस्तक्षेप का एक उदाहरण, बैतूल के सुदूरतम गाँव में महिलाओं द्वारा अपने कोविड मुक्त गाँव  के प्रयास हेतु गाँव के सीमा पर युवाओं के सहयोग से प्रवेश सम्बन्धी पहल करना आदि ) माँओं/ महिलाओं  का अपने बच्चों तथा समुदायों के  प्रति जागरूकता के बेमिसाल उदाहरण पेश करते हुए कहा कि हमें ग्रामीणों को कम न आंकते हुए उनके स्वास्थ्य के मुद्दों पर मैत्रीपूर्ण एवं सरल व्यवहार अपनाते हुए उन्हें सामुदायिक स्तर पर जागरूक किये जाने की नितांत आवश्यकता है।

उन्होंने इस क्रम में, सरकार द्वारा उचित हस्तक्षेप करते हुए आम  जनता को इस वैश्विक महामारी की  गंभीरता को समझते हुए समुचित रोकथाम के उपाय एवं व्यवहार(मास्क लगाना, बार-बार हाथ धोना, टीकाकरण की महत्ता , सरकारी प्रोटोकॉलका सख्ती से अनुपालन किया जाना आदि ) हेतु जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के क्रम संभव व सुकर  योजना बनाने की अपील की। 

साथ ही, उन्होंने ग्रामीण समाज से जुड़ें कई वास्तविक पहलूओं पर गंभीरता से काम करने की सलाह देते हुए कहा कि ग्रामीणों से न केवल समन्वय स्थापित करने की जरुरत है,  बल्कि उन्हें तो स्थानीय स्तर पर नेतृत्व प्रदान करने की जरुरत है क्योंकि वे ही अपने समस्याओं को अच्छी तरह समझते हुए इसका बेहतर हल निकाल  सकते हैं।

इसके अलावे, ग्रामीणों से उनके क्षेत्रीय भाषा या स्थानीय बोलियों में ही संपर्क साधने से उनतक सरकारी निर्देशों व  योजनाओं के प्रति बेहतर तरीके से रूचि पैदा करते हुए इसके ग्रामीणों के बीच पहुँचने तथा इसके सफल परिणाम की आशा प्राप्त की जा सकती है।

साथ ही, उन्होंने तीसरी लहर के मद्देनज़र अभी से ही सतर्क रहने की सलाह देते हुए बच्चों को ज्यादा सुरक्षित रखने को कहा एवं मीडिया व अन्य सोशल मीडिया द्वारा इस महामारी से जुड़े भ्रामक जानकारियों की कड़ी निंदा करते हुए इसे कोविड से लड़ने की दिशा में चुनौतीपूर्ण बताते हुए अपने वक्तव्य का समापन किया।

पैथोलोजी एवं गाँधी दर्शन

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अंतिम चर्चाकार, श्री राकेश पालीवाल (सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य आयकर आयुक्त, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़) ने कोविड  की इस दूसरी लहर का इन दोनों राज्यों के संरचनाओं को देखते हुए मुख्यत: दो ढाँचों अथवा दृष्टिकोणों -पैथोलोजी एवं गाँधी दर्शन के आधार पर वास्तविक आकलन करने की सलाह देते हुए अपने विचार रखे।

उन्होंने कोविड की विभीषिका से बचने के क्रम  में सबसे पहले गाँवो  को बचाने की अपील करते हुए राष्ट्रपिता स्वर्गीय महात्मा गाँधी के विचारों को अपनाने का सुझाव देते हुए कहा कि यह प्राचीन समाज की तर्ज़  पर न होकर वर्तमान ग्रामीण परिदृश्य में होना चाहिए।

साथ ही, उन्होंने रोग-निदान दृष्टिकोण (पैथोलोजी) के अंतर्गत “इलाज से बेहतर रोकथाम है” स्वर्णिम नियम  का ही हवाला देते हुए कोविड  निराकरण की दिशा में काम करते हुए पिछली गलितयों का मूल्यांकन करने की सलाह देते हुए भविष्य में बुद्धिमत्तापूर्ण तरीके अपनाने को कहा।

इसी संदर्भ में, उन्होंने कोविड  की पहली एवं दूसरी लहर के बढ़ने सम्बन्धी आँकड़ों(जहाँ पहली लहर में १०००से १ लाख होने में ३ महीने का वक़्त लगा, वहीं दूसरी लहर में दिनों के अंतराल पर ही १० हज़ार से ४ लाख मामले बढ़ें ) के आधार पर इस आपदा से लड़ने में कठिन बताते हुए सरकारी योजनाओं के विफल एवं जमीनी तौर पर कारगर न होने( केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा बंद एसी कमरे में ग्रामीण वास्तिवकताओं एवं भारत की विविधता को नजरअंदाज कर नीतिगत फैसले लेना आदि )  की चिंता व्यक्त की।  साथ ही, उन्होंने कहा कि अबतक विकेंद्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था में ग्राम स्वायत्तता को सही मायने में कार्यान्वयन नहीं होने से गाँवो  का विकास अवरुद्ध हुआ है।

साथ ही, उन्होंने यूरोपीय संकल्पना- “पैथोलोजी” को ग्रामीण स्तर पर अपनाये जाने की वकालत टेस्टिंग एवं टीकाकरण की चुनौतियों (ग्रामीण समाज में नीम -हक़ीम , तांत्रिक द्वारा लोगों को  गुमराह किया जाना )से निपटने के क्रम में दीं। 

इसके अलावे, प्रशासनिक अधिकारियों को भारतीय गाँवों  की वर्तमान परिदृश्य में समझते हुए योजनाओं को लागू करने का सुझाव दिया, विशेषकर जिलापदाधिकारी के सम्बन्ध में (प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्गत एक प्रशासनिक अधिकारी की डीएम  से सचिव बनने तक लगभग ३० वर्षों की यात्रा करनी होती है, फलत: वे ग्रामीण समाज से पहली व  अंतिम बार केवल अपने सेवाकाल के प्रशिक्षण अवधि के दौरान  ही परिचित हो पाते हैं )।

आगे, श्री राकेश पालीवाल ने कहा कि गाँधी दर्शन एवं  पैथोलोजी के सिद्धांतों के संयुक्त प्रयासों के आधार पर ही गाँवों  में कोविड  के मामलों को नियंत्रित कर बचा सकते हैं। साथ ही, कोविड तैयारियों के क्रम में  पहले ही विचार कर लेना होगा ताकि बड़े पैमाने की असफलता न देखने को मिलें। इसी क्रम में, उन्होंने पिछले महीने हुए राज्य के कोविड की तैयारियों से जुड़ें अपने  प्रशासनिक पहलों की जानकारी साझा करते हुए कहा कि इसमें देश के १२ राज्यों के ३६ एनजीओ द्वारा तैयार योजनाओं की सविस्तार जानकारी उपलब्ध करायी।

इसी संदर्भ में उनहोंने बताया कि  किस तरह कुछ गाँधीवादी संस्थाओं के साथ देश के पांच हिस्सों में करीब ७ आदर्श गाँवों (ये गाँव मुख्यत: तेलंगाना, गुजरात, उत्तर प्रदेश, एवं मध्य प्रदेशों में हैं जो कि पूरी तरह से (१००%) जनजातीय क्षेत्रों में शामिल हैं और इनमें से मूलत: ४ आदिवासी गाँव की श्रेणी में आते हैं ) की स्थापना की पहल की गयी है।  ये ऐसे गाँव  है, जिनमें सभी परिवार निर्धनता रेखा के नीचे  गुजर-बसर करने वाले हैं और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत ही पक्के मकान  बनाये गये हैं। इसके अलावे, मार्च २०२१ तक इन क्षेत्रों में कोविड  मामलों के मद्देनज़र टीम तैयार कर स्थानीय स्तर पर आइसोलेशन -केंद्र बनाये गये। 

इन सबके अलावे, उन्होंने कोरोना मुक्त गाँवों  की संकल्पना के महत्व को निर्धारित करते हुए कहा कि ग्रामीण समाज के सुरक्षात्मक उत्थान की दिशा में कुछ बिंदुओं पर समग्रता से विचार किये जाने की नितांत आवश्यकता है, जैसे कि नीतिगत फैसलों में विभिन्न विपक्षी दलों एवं ग़ैर -सरकारी संगठनों की राय प्राप्त करना ,हिन्द स्वराज का उदाहरण लेते हुए  देश की विविध संस्कृतियों को बराबर सम्मान व ध्यान देते हुए निर्णय लेना (उनके अनुसार- आदिवासी बहुल इलाके होशंगाबाद में अंत्योदय योजना ३ साल से जमीनी स्तर पर कार्यान्वित नहीं एवं इन अति निर्धन क्षेत्रों में होम-आइसोलेशन की बात बेमानी ) आदि।

साथ ही,  कोविड संबंधी तैयारियों के क्रम  में ग्रामीण आधारिक संरचनाओं के उचित उपयोग करने की दिशा में राज्य के सभी एनजीओ  से संपर्क स्थापित करना जरुरी है। 

अन्य सुझाव देते हुए कहा कि राज्य सरकारों को कम-से -कम १ साल के लिए बेरोजगार डॉक्टर एवं नर्सों की नियुक्ति कर इस विकट  आपदा में उनके सेवाओं का लाभ उठाना चाहिए। साथ ही, कोविड  की रोकथाम के लिए उचित व्यवहार अपनाते हुए लापरवाही से दूर रह कर खुद को और पुरे समाज को बचाना होगा।  इसके अतिरिक्त घरेलू सहायकों एवं अन्य मजदूर वर्गों को ही इस रोग के वाहक न समझकर भेदभाव को रोकना होगा ताकि सामाजिक समरसता बनी रहे। आगे उन्होंने दृढ़ता से कहा कि परिश्रम करने से ही हम स्वस्थ रह सकते हैं, अतः  भारत जैसे देश के लिए “सिर्फ रोकथाम ही कारगर युक्ति है”।

साथ ही, राज्य में केंद्र सरकार के उचित परामर्श एवं आर्थिक सहयोग के आधार पर कोविड  काल  में विभिन्न सामाजिक-आर्थिक सरकारी योजनाओं एवं मेडिकल सुविधाओं आदि की प्रत्येक जिला के स्तर पर  योजना बनानी होगी।

साथ ही , अपने वक्तव्य के दौरान श्री पालीवाल ने अपने कई प्रशासनिक अनुभव साझा किये।  योजना निर्धारण के अन्य पहलू  पर उन्होंने पंचायत स्तर पर सभी जनप्रतिनिधियों (सरपंच, पंचायत सचिव  एवं पंचायत के सदस्य) एवं ग्रामीण स्वशासन इकाई के विभिन्न हितधारकों (पटवारी, फॉरेस्ट गार्ड , पुलिस कॉन्सटेबल , आँगनवाड़ी व आशा वर्कर्स एवं एनजीओ आदि) की भूमिका को ग्राम विकास हेतु मजबूती से पालन कराये जाने की जरूरत है।

इसी क्रम में, यह भी सुझाव दिया कि गांधीवादी दृष्टिकोण को अपनाते हुए एक आदर्श गाँव  की संकल्पना को सिद्ध करने की दिशा में किसी एक एनजीओ (साथ ही, उन्होंने देश में ग़ैर -सरकारी संगठनों एवं उनकी वित्तीय अनियमितताओं व  भ्रष्टाचारपूर्ण आचरण की आलोचना भी की।) द्वारा राज्य के  कम -से- कम ५ गाँवों के विकास की सम्पूर्ण जिम्मेदारी  लेकर सूक्ष्म स्तर पर आत्मनिर्भर,सक्षम  एवं सशक्त करने की दिशा में समग्रता (स्वच्छता, पोषण, पेयजल, मूलभूत सुविधाएं आदि पर ) से काम करने की बहुत जरुरत है।

अंत में, उन्होंने “हिन्द स्वराज” में वर्णित गाँधीजी के विचारों को साझा करते हुए कहा  कि  गाँव  के संबंध में केवल एक ही ख़राबी  है और वह है यहाँ ग्रामीणों में भयंकर आलस एवं गंदगी होती है- जो इनके विकास के मार्ग को सर्वदा अवरुद्ध करती है। साथ ही, यह भी दावा  किया कि  स्वच्छता मिशन ने बहुत हद तक

 ग्रामीण अस्वच्छता की चुनौतियों को वर्तमान में कम  कर दिया है। साथ ही, उपरोक्त वर्णित  देश के विभिन्न राज्यों के ३६ ग़ैर -सरकारी संगठनों एवं उनके प्रतिनिधियों द्वारा प्रत्येक सप्ताह २ घंटे के लिए वेबिनार के आयोजन की जानकारी देते हुए इसे ग्रामीण समाज के सूक्ष्म स्तर कार्ययोजनाओं की दिशा में अवश्यंभावी बताते हुए , विभिन्न मीडिया -समूहों द्वारा ऐसे  ग़ैर -सरकारी संगठनों  के अच्छे कामों की सराहना अथवा प्रचार-प्रसार नहीं करने पर भी आपत्ति  दर्ज़ करते हुए अपनी बातों से विराम लिया।

ग्रामीण समाज

anjali

चर्चाकार की  भूमिका में श्रीमती अंजलि नोरोन्हा (अध्येता( Fellow),एकलव्य) ने  अपनी बात रखने से पहले , भारतीय  चिकित्सा जगत के जाने- माने हस्ती डॉ शेखर अग्रवाल को को याद कर भावभीनी श्रद्धांजलि देते हुए इसे मेडिकल व्यवस्था के लिए एक अपूरणीय क्षति बताते हुए कोविड  के इस दूसरे चरण को गंभीरता से लेने की सलाह देते अपने विचार रखें।  साथ ही, ग्रामीण समाज की वास्तविकताओं का विश्लेषण करते हुए कुछ प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा की, वे हैं –

१. कोविड की दूसरी लहर न आने तक ग्रामीण समाज में यह भ्रम था कि यह बीमारी केवल समाज के संपन्न एवं नगरीय क्षेत्रों तक सीमित  है, अतः उन्होंने एहतियात नहीं  बरतें  और मामले बढ़ते गए।

२. देश के नेताओं ने चुनावी प्रचार-प्रसार के दौरान बढ़ -चढ़कर भीड़ इकट्ठा कर इस वैश्विक महामारी में वृद्धि दर्ज कराया, जबकि यह समय इसके रोकथाम व जागरूकता के लिए होना चाहिए था।

३. इस चरण में निर्धन एवं घरेलू सहायकों पर रोगवाहक के पहलू पर संदेह न करते हुए यह विचार किये जाने कि क्यों पिछले साल प्रवासी श्रमिकों के एकाएक बड़ी संख्या में गाँव  वापसी पर भी ग्रामीण व्यवस्था में कोरोना का प्रभाव बहुत कम रहा था

तो इस चरण में  कोरोनावायरस म्यूटेंट ने इतना घातक रूप कैसे पकड़ लिया, जिससे परिस्थितियों में गिरावट दर्ज़  की गयी।

४. इस कोरोनावायरस के नए म्यूटेंट ने नगरीय व्यवस्था पर भी चोट पहुँचायी क्योंकि कोविड रोकथाम के उचित व्यवहार नहीं अपनाये गए -जैसे कि  मास्क ठीक से न लगाना , सामाजिक दूरी के निर्देशों का अनुपालन न करने से , एयर कंडीशन के  उपयोग से विटामिन-डी की कमी हुई , जिससे इस फ़्लू -वायरस ने देखते -ही- देखते  विकराल रूप धारण कर लिया। 

५. इसके अलावे, कोविड  संक्रमित व्यक्तियों ने भी अपने गैर -जिम्मेदाराना व्यवहारों से भी मामलों में बढ़ोतरी करायी। साथ ही, इस संबंध  में उचित  टेस्टिंग, टीका लगाना आदि  पहलूओं पर ध्यान देते हुए संक्रमण एवं मृत्यु दर के वास्तविक आँकड़ों  का प्रति-परीक्षण करने की भी जरूरत है। 

६. उन्होंने गर्भवती महिलाओं के अबतक वैक्सीन-ट्रायल न होने से उनके लिए टीकाकरण के संबंध में भ्रम बने होने की बात की। साथ ही, कोविड  संक्रमित  मामलों का टेस्टिंग या लक्षणों के ही आधार पर  जितनी जल्दी पहचान कर ली जाये,उतना इससे स्वास्थ्य लाभ के लिए कारगर सिद्ध होगा। यहाँ यदि कोई गैर सरकारी संगठन

“होम टेस्टिंग किट्स” आदि उपलब्ध करा पाए तो बेहतर होगा। 

७. साथ ही, कोविड  के रोकथाम संबंधी उचित व्यवहार को अपनी रोजमर्रा जिंदगी में आदतन शामिल करना होगा, इसके लिए भी गैर सरकारी संगठनों  की मदद ली जा सकती है।

८. आगे, उन्होंने बताया कि  होम – आइसोलेशन के बजाय कोविड संगरोध केंद्र स्थापित करने की नितांत जरुरत है।  इसी संदर्भ में , श्रीमती अंजलि नोरोन्हा ने इन केंद्रों में बेसिक सुविधाओं जैसे – चादर एवं अन्य दैनिक चीजों की आपूर्ति के बारे में सरकारी महकमे से और अच्छी तरह काम करने की उम्मीद जगायी।  साथ ही, मध्य प्रदेश राज्य के सागर जिले की बंद पड़ें कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की दुर्दशा का वर्णन करते हुए इनके पुनर्जीवित किये जाने की सरकार से माँग  की।

९. अंत में, राज्य के विभिन्न स्वास्थ्यकर्मियों -आशा एवं एएनएम(सहायक नर्स दाई) आदि  को ढाढंस बनाते हुए समुदाय के युवकों के साथ सहयोगी योजनाएं बनाकर कोविड  से निपटने के लिए मिलकर काम करने की जरूरत है।

संचार व सम्पर्क रणनीतियां

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अंत में , डॉ अंशुमान करोली (लीड – स्थानीय शासन, प्रिया,(PRIA) नई दिल्ली) ने अपने व्यक्तव्य में जिन मुद्दों पर अपनी बात रखी , वे निम्नलिखित इस प्रकार  हैं :

१. कोविड के दूसरे चरण का असर विगत मार्च महीने में सर्वप्रथम महाराष्ट्र , पंजाब में ज्यादा रहा, जिसके परिणाम स्वरुप केंद्र सरकार  ने ब्रिटेन की सभी  उड़ानों पर पाबन्दी लगा दी ।  साथ ही,  देश के शहरों की तुलना में गाँवों  में तबतक प्रभाव कम रहा।  इस चरण में भी मजदूरों के रिवर्स माइग्रेशन संकट एक फिर देखने को मिलें। इसके अलावे, देश  राज्यों ने दूसरे चरण के प्रचंड रूप को देखते हुए अपने स्तर पर आंशिक एवं पूर्णत लॉक डाउन के दिशा-निर्देश जारी किये।

२. आगे ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की बात करते हुए डॉ करोली ने कहा कि  पंचायती राज मंत्रालय को हर राज्य के सभी गाँवों में स्वास्थ्य आधारभूत संरचनाओं के बेहतर उपलब्धता तय करने की दिशा में दृढ़ता से काम करते हुए पंचायतों को सशक्त एवं सक्षम करने की जरुरत है , इसके राज्य-केंद्रीय प्रायोजित योजनाएं एवं सलाह के तहत  सामुदायिक तैयारी हेतु विभिन्न सिविल सोसाइटी को भी अग्रिम भूमिका देने की जरुरत है।

३. साथ ही, स्थानीय स्तर पर रणनीतिक संपर्क साधने की जरुरत है, ताकि स्थानीय जनों तक पहुँच बनाते हुए समाज के अंतिमतम व्यक्ति के अधिकारों को सम्बोधित किया जा सकें। 

४. उन्होंने १५ वें  वित्त आयोग का उल्लेख करते हुए बताया कि इसमें ब्लॉक स्तर पर के प्राथमिक एवं सामुदायिक स्वास्थ्य  केंद्रों के रुग्णावस्था से निज़ात पाने का स्पष्ट आर्थिक सहायता के प्रावधान है। इसी क्रम में, सुझाव दिया कि राज्य सरकार को  सिविल सोसाइटी के साथ मिलकर पंचायत स्तर पर कोविड की तीसरी लहर की तैयारियों हेतु मजबूत करना होगा। 

५. कोरोना की तीसरी लहर की रणनीतिक के अंतर्गत ग्राम, ब्लॉक एवं जिला स्वास्थ्य योजना बनाने के क्रम में सरकार , सिविल सोसाइटी एवं अन्य दाता एजेंसियों के साथ सामंजस्य एवं विश्वास के साथ काम काम करने की नितांत आवश्यकता है।

चर्चा के अंतिम पायदान पर,  कोविड के द्वितीय चरण को देखते हुए  पैनेलिस्ट द्वारा कुछ सिफारिशें और रणनीतियों को बिंदुवार साझा किया गया।  डॉ संजय सिंह ने इस चर्चा को सारगर्भित एवं विविधतापूर्ण करार देते हुए मुख्यत: विचारों  को इंकित किया: १. संचार व सम्पर्क रणनीतियां , २.  सहयोग और विभिन्न हितधारकों के गठबंधन आदि।

इसी क्रम में, आईएमपीआरआई टीम के डॉ अर्जुन कुमार ने एकमुश्त आपदा प्रबंधन पर काम करने की वकालत करते हुए एक प्रश्न भी साझा किया -“मध्य प्रदेश राज्य में इस वैश्विक महामारी के दौर में  नीम हकीम एवं झोला -छाप डॉक्टर से कैसे बचा जाये”?

सुश्री आभा शर्मा  ने अपने मत के निष्कर्ष में कोरोना की तीसरी लहर को ध्यान में रखते हुए ग्रामीण स्तर पर राज्य सरकार से  संचार रणनीति के तहत विविध दृष्टिकोण

अपनाने का सुझाव दिया। इसके अंतर्गत सिविल सोसाइटी की भूमिका, ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों के मध्य टीकाकरण को लेकर स्पष्ट  चिह्नांकन की प्रक्रिया, ग्रामीण स्वास्थ्य एवं पोषण, विकास तथा वार्षिक योजना के तहत वित्तीय आवंटन आदि के मुद्दों को समग्रता से सम्बोधित किया जाये ।

पंचायती राज संस्था

श्री ऋषि मिश्रा ने संक्षेप में,  पंचायत की भूमिका  एवं  वित्तीय विकेन्द्रीकरण के   निम्न बिंदुओं पर अपनी बात रखी , वे हैं:

1. प्रतिक्रिया: आपदा से निपटने के लिए पंचायती राज संस्थाओं को संसाधन आवंटन (संयुक्त कोष में वृद्धि),

2. जोखिम न्यूनीकरण: स्थानीय संसाधन जुटाने के लिए पंचायती राज संस्थाओं का अल्पीकरण , पर्याप्त शक्तियाँ, पंचायती राज संस्थाओं का वित्तीय विकेंद्रीकरण एवं

3. लचीलापन: व्यापक और एकीकृत ग्रामीण स्तर की स्वास्थ्य नीति (स्थानीय नीति), पीपीसी (सार्वजनिक-निजी और सामुदायिक भागीदारी पहल) को बढ़ावा देना।

कोविड जागरूकता

श्री भूपेश तिवारी ने दूसरी लहर से निपटने हेतु अपनी सिफारिशों में विशेष तौर पर कोविड जागरूकता अभियान को स्थानीय भाषा में चलाने  की वकालत करते हुए कोविड  टेस्टिंग एवं रोकथाम , टीकाकरण आदि पर ज्यादा जोर दिया। साथ ही, जिला प्रशासन एवं ग़ैर सरकारी संगठनों के समन्वयकारी भूमिका, आइसोलेशन केंद्रों की व्यवस्था हेतु के विभिन्न सिविल सोसाइटी का सहयोग प्राप्त करना , आदिवासी क्षेत्रों में लॉक-डाउन की  स्थिति में प्रशासन की ओर से खाद्य सुरक्षा का आश्वासन एवं गाँवों  में अस्थायी तौर पर आइसोलेशन झोपड़ियों की व्यवस्था आदि की उम्मीद जतायी ।

“नीचे से ऊपर का दृष्टिकोण”

डॉ श्रीमती के. एफ. काज़मी  ने अपने समापन टिप्पणी में सबसे पहले एक अन्य स्पीकर की गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं के टीकाकरण की भ्रम की स्थिति पर स्पष्टता देते हुए सरकार के नवीनतम गाइड लाइन को साझा किया।  साथ ही, भारत सरकार की विभिन्न स्वास्थ्य सुरक्षा योजनाओं व सेवाओं (आयुष्मान भारत, प्रधानमंत्री  जन औषधि केंद्र , प्रधानमंत्री  जीवन ज्योति बीमा योजना आदि ) एवं स्वास्थ्य प्रबंधन प्रणाली(आरोग्य-सेतु )  का विश्लेषण करते हुए इनके ग्रामीण व्यवस्था के अंतर्गत -“नीचे से ऊपर का दृष्टिकोण” अपनाते हुए राज्य सरकारों को एक नए व स्वस्थ  भारत तथा नई पीढ़ी के विकास तथा उत्थान की दिशा में काम करने की सलाह दी।

साथ ही , उन्होंने अन्य देशों (जर्मनी, चीन, ऑस्ट्रेलिया एवं  न्यूज़ीलैंड) की सरकारों की अपने नई पीढ़ी के प्रति गंभीरता का उदाहरण  देते हुए पूरे  राष्ट्रीय व राज्य  स्तर पर भी समृद्ध एवं स्वस्थ समाज  की परिकल्पना की कामना करते हुए अपनी बात रखी।

साथ ही, उन्होंने ग्रामीण स्वास्थ्य एवं समाज की विभिन्न चुनौतियों का उल्लेख करते हुए ग्रामीणों से उनकी स्थानीय भाषा में संवाद स्थापित करने की सलाह देते हुए ग्रामीण जिजीविषा का कई निजी अनुभवों(खासकर महिलाओं के बारे में )  से उदाहरण दिया।  इसके अलावे, ग्रामीण व्यवस्था के अन्तर्गत विभिन्न सरकारी सामजिक-आर्थिक एवं मौद्रिक  सहायताओं (पीडीएस एवं प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना आदि( PMMVY भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला एक मातृत्व लाभ योजना है जिसके तहत महिलाओं को पोषण से  राहत दिलाने हेतु आर्थिक मदद दी  जाती है।))के संदर्भ में ख़ामियों  का जिक्र करते हुए इससे और सुदृढ़ एवं लोक कल्याणकारी बनाने का सुझाव दिया। 

आगे, उन्होंने कोविड के जाँच कार्यों में लगे विभिन्न स्वास्थ्यकर्मियों (जैसे कि एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) में शामिल आँगनवाड़ी वर्कर्स ) के पास सर्वे के दौरान एंड्रॉयड फोन न होने से भी कठिनाईयों  का सामना करना पड़ता है। साथ ही, इस दूसरी लहर की तैयारियों की दिशा में सामुदायिक जागरूकता व  सतर्कता एवं ग्रामीण स्वास्थ्य तथा स्वच्छता हेतु स्थानीय स्तर पर जनसहयोग के माध्यम से काम करने की आवश्यकता है।

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श्री राकेश पालीवाल ने २१ वीं  सदी में भी गाँधी की प्रांसगिकता को सही ठहराते हुए ग्रामीण समाज के पुनरुत्थान  में नव-उदारवादी दृष्टिकोणअपनाये जाने की वकालत करते हुए अपने निजी अनुभवों के माध्यम से कुछ विचारों, सुझावों व बिंदुओं को साझा किया , वे इस प्रकार हैं:

१. आदर्श ग्राम की स्थापना: ग्रामीण श्रम के बलबूते  गाँव में कोई भी निर्माण कार्य करने से ग्रामीणों में नैतिक अहमियत की भावना पनपती है और वे जीवन भर उन सेवाओं की रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं।

२. गैर सरकारी संगठनों की सामाजिक अंकेक्षण की जिम्मेवारी एवं “हिन्द स्वराज ” में लिखित गाँधी के सिद्धांत के ग्राम विकास की रचनात्मक कार्यक्रम की दिशा में वर्णित १४  बिंदुओं का विवेचन करते हुए वर्तमान परिदृश्य में भारतीय गाँवों के वैज्ञानिक उन्नयन की आवश्यकता है। 

३. ग्रामीणों की समस्याओं का निराकरण उनके स्थानीय बोली या भाषा में ही  किये जाने की अपरिहार्यता।

४. भ्रष्टाचार मुक्त गांव और गढ़चिरौली में मेधा लेखा के गांव की मिसाल[ प्रचलित नारा : दिल्ली औरबम्बई में हमारी सरकार और हमारे ग्राम में हम ही सरकार ]।

५. समग्रता में ग्रामीण विकास एवं कोरोना – मुक्त गाँव  की परिकल्पना – बेहतर स्वास्थ्य एवं स्वच्छता, उचित खाद्य सुरक्षा, जैविक खेती, पेयजल आपूर्ति, कोविड उपयुक्त व्यवहार के लिए जागरूकता अभियान आदि।

६. विचारों का आदान-प्रदान दृष्टिकोण-गांवों के समग्र विकास और स्थिरता के लिए, हमें ग्रामीणों (प्रकृति और रोग-निदान संबंधी) के साथ विचारों का आदान-प्रदान करना होगा।

७. आकस्मिकता के लिए तैयारी- हमें मजबूत इच्छाशक्ति के साथ पंचायती राज संस्थाओं को तैयार या मजबूत करना होगा ताकि वे अन्य हितधारकों के साथ ठीक से समन्वय कर सकें।

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श्रीमती अंजलि नोरोन्हा ने प्रमुखत:  जो संस्तुतियां पेश की वे इस प्रकार रहीं:

१. ग्रामीण स्तर पर आइसोलेशन केंद्रों की स्थापना की नितांत आवश्यकता एवं होम- आइसोलेशन की चुनौतियाँ।

२. कोरोना की दूसरी एवं तीसरी लहर को ध्यान में रखते हुए सामुदायिक रणनीतियों में विविधिता का होना।

३. कोविड  की दूसरी लहर के प्रसार को देखते हुए सभी सरकारी दिशा-निर्देशों एवं आईसीएमआर के प्रोटोकॉल को ग्रामीण जनता के बीच उनके स्थानीय बोली व  भाषा में ही यथासम्भव उपलब्ध कराने  का प्रयास करना।

४. चिकित्सक समूह या बिरादरी के प्रति कृतज्ञता दर्शाते हुए उनकी योगदान एवं सेवाओं का मदद लेना एवं देना आदि।

५. साथ ही, नीतिगत फैसलों के तहत तीसरी लहर में इस वैश्विक आपदा का  पूर्वानुमान करते हुए टीकाकरण की प्रक्रिया पर जोर देना। इसके अलावे, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के बुनियादी ढांचे और चिकित्सा कर्मचारियों की नियुक्ति हेतु राष्ट्रीय  बजट में लगभग ५ % (सकल घरेलू उत्पाद पर व्यय की सिफारिश ) का आवंटन किया जाना श्रेयस्कर होगा।  इसी क्रम में, एक चरणवार रणनीति के तहत अगले १ वर्ष के लिए प्रत्येक ३-३ महीने की रणनीति बनाने का सुझाव आदि।

चर्चा के  समापन में , इस पैनल चर्चा के सह-आयोजक डॉ संजय सिंह (बुंदेलखंड के वाटरमैन, सचिव, परमार्थ समाज सेवी संस्थान) ने इस मंच को एक व्यापक चर्चा  का द्योतक बताते हुए तथा  सभी पैनेलिस्ट द्वारा कई मुद्दों पर  बनी आम-सहमति एवं अन्य सिफारिशों की सराहना करते हुए भी इसे दोनों राज्यों (मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़)  के उच्च प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष ले जाने का आश्वासन देते हुए इस वैश्विक आपदा से निपटने के क्रम  में एक सशक्त, समृद्ध एवं स्वस्थ समाज की कामना की और सभी का धन्यवाद देते हुए इस आयोजन को पूर्ण रूप से सार्थक बताया।

यूट्यूब वीडियो रूरल रियलिटीज़ | मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ भारतीय गांवों में दूसरी लहर से निपटने में अभ्यासी’ के ग्रामीण वास्तविकताएं अनुभव

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