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गांधी का ग्राम स्वराज्य का दृष्टिकोण भारतीय गांवों में कोविड -19 संकट से निपटने के निहितार्थ

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Arjun Kumar, Nishi Verma

सेंटर फॉर ह्यूमन डिग्निटी एंड डेवलपमेंट, आईएमपीआरआई इम्पैक्ट एंड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली और परमार्थ समाज सेवी संस्थान, झांसी के परस्पर सहयोग द्वारा एक विशेष वार्ता हेतु “गांधी का ग्राम स्वराज्य का दृष्टिकोण भारतीय गांवों में कोविड -19 संकट से निपटने के निहितार्थ” पर  एक विशेष व्याख्यान का आयोजन 24 जून 2021 को किया। जिसके प्रमुख वक्ता के रूप में डॉ आरके पालीवाल आईआरएस, (सेवानिवृत्त  प्रधान मुख्य आयुक्त, आयकर, मध्य प्रदेश, और छत्तीसगढ़ राज्य के) एवं अन्य चर्चाकर्ता भी उपस्थित थें।  

चर्चाकर्ताओं की सूचियाँ इस प्रकार हैं:  श्री दीपांकर श्री ज्ञान, (जे.ए.एस, निदेशक, गांधी स्मृति और दर्शन समिति, नई दिल्ली,), डॉ गांधी पीसी काजा, (चेयरमैन, ट्रुथ लैब्स, हैदराबाद), मुदिता विद्रोही, (शोधकर्ता, प्रलेखन सलाहकार और अनुवादक, अहमदाबाद), डॉ संजय सिंह, (सचिव, परमार्थ समाज सेवी संस्थान, उत्तर प्रदेश; बुंदेलखंड के वाटरमैन; राज्य समन्वयक, उत्तर प्रदेश, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स), डॉ सुरेश गर्ग,( संस्थापक, गांधी सुमिरन मंच, विदिशा; पूर्व में स्वास्थ्य विभाग, मध्य प्रदेश के साथ; कोरोना मुक्त गांव मिशन; डॉक्टर और वयोवृद्ध गांधीवादी) एवं विपिन गुप्ता, (संस्थापक और प्रधान संपादक, नेशनल एक्सप्रेस)।

इस कार्यक्रम की शुरुआत “प्रभाव एवं नीति अनुसंधान संस्थान” टीम की सदस्या  निशि वर्मा ( रिसर्च प्रोग्राम ऑफिसर ) ने  करते हुए सभी आगंतुकों का स्वागत भी  किया। उन्होंने विशेष रूप से इस व्याख्यान के मुख्य वार्ताकार “डॉ आरके पालीवाल” का जीवन परिचय देते हुए उनके शैक्षणिक एवं एक प्रशासकीय उपलब्धियों की जानकारी साझा की।  डॉ आरके पालीवाल ने  हिंदी भाषा के लगभग सभी विधाओं में अपना योगदान दिया है, साथ ही वे एक समाज सेवी की भूमिका का निर्वहन करते हुए अपने सेवाकाल के दौरान विशेषत: जनजातीय क्षेत्रों के पुनरुथान हेतु कार्य किया है। इसके अलावे, उन्होंने मध्य प्रदेश, गुजरात एवं तेलंगाना राज्यों में “आधुनिक ग्राम” की स्थापना , मध्य प्रदेश के ३ जिलों में “आदर्श ग्राम” में योगदान तथा प्राकृतिक आपदाओं सबंधी बचाव कार्यों (केदारनाथ एवं केरल की बाढ़ आदि ) में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की हैं।

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वर्तमान में , वे कोरोना की इस वैश्विक आपदा में भी सक्रिय होकर दिल्ली तथा ग्राम सेवा समिति,भोपाल से जुड़े हुए हैं।  उनके द्वारा लिखित कई पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं , जिनमें विशेष रूप से हिंदी साहित्य की रचनाएँ भी हैं। साथ ही, वे विभिन्न दैनिक समाचार पत्रों में अपने आलेख लिखते रहते हैं। इसी क्रम में, उन्होंने कई पुरस्कार भी प्राप्त किये हैं- सृजन पुरस्कार (उत्तर प्रदेश, हिंदी संस्थान), हिंदी गौरव पुरस्कार (राष्ट्रीय हिंदी परिषद् ) एवं भारत सरकार की ओर से राजभाषा पुरस्कार। उनकी हिंदी की रचनाओं व नाटकों को दूरदर्शन एवं अन्य मंचों पर उभारा गया है।  अपने सेवाकाल के अंतिम दिनों में वे प्रधान मुख्य आयुक्त, आयकर, मध्य प्रदेश, और छत्तीसगढ़ राज्य के पद पर बने रहें। 

डॉ आरके पालीवाल ने सर्वप्रथम इम्प्री टीम को इस व्याख्यान के शीर्षक  एवं इसकी चर्चा को हिंदी भाषा में आयोजित करने के लिए धन्यवाद एवं आभार प्रकट करते हुए कहा कि जैसा कि ज्ञातव्य है कि गाँधीजी हिंदुस्तानी भाषा की बात करते थे और उनकी  ग्राम स्वराज की अवधारणा भी हिंदी भाषा पर आधृत थीं।

चर्चा की पृष्ठभूमि गढ़ते हुए, आगे उन्होंने “गांधी का ग्राम स्वराज्य का दृष्टिकोण भारतीय गांवों में कोविड -19 संकट से निपटने के निहितार्थ” के संदर्भ में कहा कि वर्तमान राष्ट्रीय परिदृश्य में हमने यह अनुभव किया है कि महात्मा गाँधी जी की “ग्राम स्वराज्य” की यह अवधारणा धूमिल होती जा रही क्योंकि यह बात बहुत पुरानी हो गयी है।  लेकिन फिर भी कई बार बीच-बीच में इस संकल्पना पर बात उठती भी रहती है , अतः इस संदर्भ में उन्होंने इम्प्री टीम की इस मुहिम का हार्दिक अभिन्दन व्यक्त किया। 

साथ ही, बधाई देते हुए कोविड की इस वैश्विक आपदा में गाँधी के ग्राम स्वराज्य के दृष्टिकोण को भारतीय गाँवों के परिप्रेक्ष्य में एक आकलन करने की पहल को भी  सार्थकपूर्ण बताया।  उन्होंने कहा कि अगर ग्राम स्वराज्य एवं कोविड संकट से निपटने के निहितार्थ -इन दोनों पहलूओं को एक साथ लेते हुए गाँधीजी की परिसंकल्पना पर विचार किया जाना जरुरी है।  इसी दिशा में यह सोचना भी चाहिए कि यदि गाँधीजी का  ग्राम स्वराज्य वर्तमान में रहा होता तो हम इस महामारी के दौरान तथा कोविड की बाद की परिस्थतियों से  देश के गाँवों को क्या और कैसे एक बेहतर रूप में संचालित कर पाते ?

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इसके अलावे, उन्होंने हमें यह भी विचार करने का सुझाव दिया कि क्यों नहीं अबतक देश में राष्ट्रपिता के ग्राम स्वराज्य की संकल्पना को अंगीकृत नहीं किया गया और क्या यह देश में आ भी पायेगा या नहीं ? उन्होंने यहाँ अपने व्यक्तिगत प्रयासों  की चर्चा करते हुए बताया कि कोविड मुक्त ग्राम अभियान के अंतर्गत विगत दो महीनों में ही देश के १५ राज्यों में ५० ग्राम संस्थाओं को आकार देने में सफलता पायी। 

इसी क्रम में, उन्होंने जोर देते हुए कहा कि यह मूल्यांकन किये जाने की आवश्यकता है कि (भले ही, सभी के अनुभव के आधार पर ही) वर्तमान में कितना ग्राम स्वराज्य की सोच देश  में विद्यमान है – है भी या नहीं और अगर है तो कितना, अतः इस दिशा में इसकी संभावनाओं हेतु कारगर पहल  किये जाना ही समय की माँग हैं।

गाँधी जी की ग्राम स्वराज्य की अवधारणा को विस्तारपूर्वक समझाने के क्रम में डॉ आरके पालीवाल ने इसकी पृष्ठभूमि को और पीछे ले जाते हुए कहा कि ग्राम स्वराज्य  की अवधारणा तब दृष्टिगोचर हुई थी जब हमारा देश आजाद नहीं था।  उनके अनुसार- इस शब्द का जिक्र गाँधीजी ने सर्वप्रथम व्यापक रूप से अपनी एक प्रमुख किताब “हिन्द स्वराज्य “[१९०९ में रचित , जिसे गाँधीजी अपनी एकमात्र  वैचारिक पुस्तक मानते थे ] में किया था, इसी क्रम में डॉ पालीवाल ने बताया कि इस पुस्तक के २००९ में शताब्दी समारोह पर उन्होंने इसका पुनर्पाठ भी किया था – यह समझने के लिए कि गाँधीजी की “ग्राम स्वराज्य” की उत्पत्ति कहाँ से है ?

आगे बताया कि १९०९ के तात्कालिक भारतीय स्वतंत्रता काल पर ध्यान दे तो हम पाते हैं कि उस समय गाँधीजी भारत में मौजूद नहीं थे और न ही उस समयकाल में आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया था।  उस समय तो देश की राजनीति में विशेष रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी एवं उनके नेताओं की ही  प्रमुखता  थीं, अतः गाँधीजी के तात्कालिक दौर के केवल १-२ भारतीय नेताओं से संपर्क था [ध्यातव्य है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी रहे गोपाल कृष्ण गोखले को ही राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी अपना राजनीतिक गुरु मानते थे ]। 

यह भी एक रोचक तथ्य है कि गाँधीजी ब्रिटिश राज के शुरू से हिमायती थे, इसका एक उदाहरण प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान उनके अंग्रेजों का साथ देने से मिलती है [इस युद्ध में सैनिकों की बहाली के लिए गाँधीजी गुजरात में भी अपील की थी, जिसके लिए उन्हें आलोचनाएँ भी झेलनी पड़ी थीं।हालाँकि यह भी सत्य है कि उन्हें ब्रिटिश सरकार का साथ पसंद था, लेकिन साथ ही वे ब्रिटिश राज की कुछ खामियों को दूर करने के लिए भी तत्पर थे ] ।

इसी संदर्भ में यह कहना उचित होगा कि गाँधीजी ने एक नवीन संकल्पना के रूप में ग्राम स्वराज्य की अवधारणा का प्रतिपादन किया, जो कि देश की आजादी एवं स्वतंत्रता संग्राम के अर्थ में न होकर एक अद्वितीय विचार था। यही कारण है कि गाँधीजी स्वतंत्रता संग्राम के बाद के सालों में नेतृत्व प्रदान करते हुए एक अलग तरह की स्वराज्य की बात पर जोर देते है। वे कहते थे- मुझे आज़ादी की जल्दी नहीं है, लेकिन मैं स्वराज्य जल्दी चाहता हूँ। इसी क्रम में , गाँधीजी के  ग्राम स्वराज्य से तात्पर्य – हर व्यक्ति का अपने व्यवहार, आचरण, इच्छाओं एवं कर्तव्यों आदि पर आत्म -नियंत्रण से है। साथ ही, वे इस विचार की व्याख्या करते हुए अपने सभी स्वराज्य के साथी कार्यकर्ताओं से अपेक्षा की कामना करते हुए उन्हें अपने अधिकारों से ज्यादा अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहने की सलाह देते हैं।

उनका यह दृढ विश्वास था कि यदि मनुष्य अपनी मन-मस्तिष्क एवं ज्ञानेन्द्रियों  पर नियंत्रण करना सीख जाये और अपने कर्तव्यों का समुचित निर्वहन करें, तभी सही मायने में ग्राम स्वराज्य की कल्पना संभव है।  सामान्यत: मनुष्यों का स्वभाव होता है कि वे दूसरों को बदलना चाहते हैं, किन्तु स्वयं में कोई  बदलाव नहीं चाहते।  इसी संदर्भ में गाँधीजी ने कहा था कि “If you want to change the world, start with yourself”.

ग्राम स्वराज्य के सम्बन्ध में गाँधीजी ने स्पष्ट रूप में कहा है कि आजादी की लड़ाई के क्रम में आत्म- नियंत्रण करने की दिशा में कार्यकर्ताओं को सत्य एवं अहिंसा के पथ पर सदा अडिग रहने की सलाह दी। साथ ही, उन्होंने स्वराज्य के स्वरुप एवं प्रकृति  को व्यापक तौर पर समझाया, वे किसी भी सरकार -फिर चाहे वो  ब्रिटिश हो या भारतीय – इन दोनों सरकारों में ग्राम स्वराज्य के लागू किये जाने के लिए हिमायती एवं इच्छुक थे। 

यहाँ उनका तात्पर्य केवल स्वदेशी शासन से नहीं था, साथ ही  वे किसी भी सरकार द्वारा सत्ता के  विकेन्द्रीकरण किये जाने को ग्रामीण संस्कृति एवं ग्रामीण स्वराज्य की व्यवस्था में बाधक मानते थे। इसी संदर्भ में , उन्होंने कई बार अपने वक्तव्यों के माध्यम से तात्कालिक भारतीय समाज  में व्याप्त छुआछूत का उल्लेख करते हुए सवर्ण समुदायों द्वारा अत्यंजों  के प्रति दुर्व्यवहार की भी कड़ी भर्त्सना करते हुए कहा कि ऐसे में देश की आजादी का कोई मतलब नहीं रह जायेगा। 

अत: एक ऐसी स्वराज्य की स्थापना देश में करनी होगी जहाँ समाज के सभी वर्गों  का उचित सम्मान एवं प्रतिनिधत्व हो , तभी आजादी की सार्थकता है।  साथ ही, गाँधीजी ने ग्राम स्वराज्य की वकालत करते हुए ब्रिटिश राज की प्रशासनिक व्यवस्था , संसदीय प्रणाली, पुलिस व्यवस्था, उनके द्वारा  ग्रामीण परिवेश की उपेक्षा  किये जाने एवं  औद्योगीकरण आदि की भी आलोचना की और कहा कि यह पाश्चात्य  सभ्यता-संस्कृति को कुछ साल पहले की है , जबकि हमारी प्राचीन भारतीय सभ्यता- संस्कृति है, जिसके आगे यह पाश्चात्य  सभ्यता-संस्कृति कहीं नहीं टिकती। 

गाँधीजी ने ग्राम स्वराज्य की परिकल्पना अपने सत्य एवं अहिंसा के सिद्धांत पर ही की थी, एक तरह वे मोटा-मोटी “राम-राज्य” की भी बात करते हैं। अतः यह कहना उचित ही होगा कि हम कोरोना से निपटने के क्रम में, वर्तमान भारतीय ग्रामों को उस भारतीय संस्कृति में देख सकते हैं , जिसका जिक्र गाँधीजी अपने “हिन्द स्वराज”  में करते हैं।

डॉ आरके पालीवाल ने  प्रमुखता से गाँधीजी के बारे में बताते हुए कहा कि वे कैसे ग्राम स्वराज्य की स्थापना के क्रम में ग्रामीण सामाजिक बुराइयों (अशिक्षा, छुआछूत की समस्या आदि) से व्यथित थे ? गाँधीजी मुख्यत: तत्कालीन भारतीय ग्रामीणों के आलस्य एवं गाँवों में व्याप्त गंदगी को दूर करना चाहते थे। 

इसी संदर्भ में, गाँधीजी ने भारतीय ग्रामीण परिदृश्य के मुख्यत: ४ पहलूओं की विवेचना की हैं, जो इस प्रकार हैं-

१. राजनैतिक पहलू – राज्य सत्ता से सम्बन्धित।

२. सामाजिक पहलू – सामाजिक संरचना के अंतर्गत वर्गभेद, छुआछूत के रूप में सामाजिक बहिष्कार स्वरूप कुछ कुरीतियों का प्रचलन ।

३. आर्थिक आजादी का पहलू – इस संदर्भ में , गाँधीजी मानते थे कि भारतीय ग्रामीणों के पास कृषि के अलावे  अन्य रोजगार प्राप्त करने के अवसर उपलब्ध होने चाहिए। ध्यातव्य है कि तत्कालीन ग्रामीण समाज में भू अधिपतियों एवं जमींदारों ने निचले वर्गों का शोषण कर गुलामी  की प्रथा को एक अन्य अर्थ में कायम किया था। अतः यह कहा जा सकता है कि भारतीय गाँवों को सही मायने में आजादी नहीं मिली थी क्योंकि वे आर्थिक रूप से आत्म -निर्भर नहीं थे। इस अर्थ में, गाँधीजी ने खादी -ग्रामोद्योग का सुझाव भी दिया।

४.   धार्मिक एवं आध्यात्मिक आजादी के संदर्भ में, गाँधीजी ने विशेष तौर पर हिन्दू-मुस्लिम की आपसी मतभेद को दूर करने हेतु सर्वदा सांप्रादियक तनाव की निंदा करते हुए सांप्रादियक सौहार्द की प्रेरणा दी। 

उपरोक्त वर्णित तर्कों के आधार पर गाँधीजी की ग्राम स्वराज्य की दिशा में प्रतिबद्धता इस बात से उजागर होती है कि वे  अपने मौत के कुछ दिन पहले तक अपने इस सपने को साकार करने के क्रम में, गुजरात के वर्धा नामक स्थान से इसकी फिर से ठीक से शुरुआत करना चाहते थे।

हालाँकि “नियति को कुछ और ही मंजूर था” और उनकी ३० जनवरी, १९४८ को हत्या हो गयी , जिसके साथ ही उनका यह स्वप्न अधूरा रह गया।  गाँधीजी हमेशा का विश्वास था कि  भारत की आत्मा इसके गाँवों में बसती है। अतः  उनका मानना था कि देश का विकास पूर्ण रूप से तभी संभव है जब भारतीय गाँवों का समग्रता के साथ विकास किया जाये, इस क्रम में उन्होंने शैक्षणिक , नैतिक एवं पर्यावरणीय विकास की वकालत करते हुए गाँवों को एक आत्म-निर्भर इकाई के रूप में प्रस्तुत किया है।

आगे अपने व्याख्यान में , डॉ आरके पालीवाल ने  गाँधी के ग्राम स्वराज्य के अंतर्गत ग्रामीण स्तर पर सत्ता के विकेन्द्रीकरण [ग्राम सभा एवं ग्राम पंचायत पर आधृत ]के भी दृष्टिकोण की विवेचना की। इसी क्रम में , डॉ पालीवाल ने सुझाव दिया कि सत्ता विकेन्द्रीकरण के संदर्भ में  सरकारी विभागीय आवंटन में यह बात ध्यान  दिया जाना चाहिए कि सिर्फ प्रमुख विभाग राज्य एवं केंद्र सरकारों को आवंटित किये जाये ताकि ग्राम सभा एवं ग्राम पंचायतों आदि को भी प्रशासनिक स्वायत्तता वास्तविक अर्थों में प्रदान की जा सकें।

साथ ही, इस क्रम यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कैसे किसी ग्रामीण योजनाओं के निर्णय एवं  क्रियान्वयन में जन भागीदारी तय करना नितांत आवश्यक है। ज्ञातव्य है कि नौकरशाही ही कोई भी ग्रामीण नियोजन हेतु  कानून-निर्माण व लागू  कराने का कार्य करता है।

उदाहरणार्थ , मनरेगा योजना के अंतर्गत प्रशासनिक अधिकारियों की अनुमति से ही गाँवों में केवल एक तालाब खुदवाने हेतु अधिक देरी का सामना करना पड़ता है क्योंकि नौकरशाही की प्रक्रिया काफी धीमी एवं जटिल है।   साथ ही, यह समझा जा सकता है कि ग्रामीण व्यवस्था का सही आकलन करने में जितनी आसानी स्थानीय जनता को होगी, उतनी अन्य किसी अन्य अधिकारी या निकाय को नहीं।

अतः इस संदर्भ में, पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत भारतीय गाँवों को उचित वित्तीय स्वायत्तता प्रदान किये जाने की जरुरत है ताकि स्थानीय स्वशासन के मंच  पर ही  ग्रामीणों से जुड़ीं सभी समस्याओं को ग्रामीण नागरिकों की सहमति से निर्णीत कर उन्हें थोड़ी ही मात्रा में सही , लेकिन विधायी, कार्यपालिकीय एवं न्यायिक शक्तियों का  रसास्वादन दिया जा सकता है ।

साथ ही, यह बात भी रोचक है कि गाँधीजी ने अपनी पुस्तक “हिन्द स्वराज” में तत्कालीन ग्रामीण समाज की आलोचना करते हुए ग्रामीण स्वायत्तता की वकालत की।डॉ आरके पालीवाल ने  इसी क्रम में चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि क्या हम वर्तमान परिदृश्य में भी यह कल्पना कर सकते हैं कि कोई ग्रामीण और विशेषकर  जनजातीय क्षेत्रों के नागरिक न्याय के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँच रखने में सक्षम एवं आत्म-निर्भर है, ऐसे में आज भी गाँधी जी का ग्राम स्वराज्य एक चुनौतीपूर्ण संकल्पना है।

इसी संदर्भ में, उन्होंने गांधीजी के ग्राम स्वराज्य के सपनों का विवेचन करते हुए डॉ आरके पालीवाल ने यह भी सुझाव दिया कि  देश के आर्थिक विकास के मॉडल को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के अंतर्गत खेती-बाड़ी से संबंधित वस्तुएँ  एवं ग्रामोद्योग के रूप में कपास-उत्पादन की उपलब्धता का लाभ उठाते हुए हस्तकरघा एवं हस्तशिल्प आदि की शुरुआत की जा सकती है।

जिसके तहत  ग्रामीण  मानव-संसाधनों का समुचित उपयोग करते हुए उन्हें स्थानीय स्तर पर ही रोजगार के अवसर उपलब्ध कराते हुए उन्हें  स्वावलंबी बनाया जा सके ताकि वे अपनी हर छोटी- छोटी जरूरतों के लिए शहरों पर निर्भर न रहें और अपने विकास के मार्ग खुद प्रशस्त करते हुए तथा बाजार की आवश्यकता हेतु शहरों का रुख़ न लेते हुए अपने गाँव  को ही हर पैमाने पर व्यापक स्वरुप में  सबलता  एवं आत्म -निर्भरता प्रदान करने का यथाशक्ति प्रयत्न करें ।

डॉ आरके पालीवाल ने यह भी बताया कि कैसे गाँधीजी विकेन्द्रीकरण की तर्ज़ पर ही पंचायती स्तर पर ग्रामीण विवादों को निस्तारण करने में विश्वास रखते थे।  इसी संदर्भ में, अपने निजी प्रयासों को साझा करते हुए डॉ पालीवाल ने बताया कि कैसे हाल ही में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के एक दिशा-निर्देशों के अंतर्गत देश के विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों में “विवादहीन ग्राम योजना” का संचालन किया जा रहा है [उदाहरण हेतु – मध्य प्रदेश विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा भी ऐसी ही पहल कार्यान्वित है , जिसके तहत मध्य प्रदेश राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ग्रामीण विवादस्पद मामलों का जल्दी निपटारा कर  उसकी रिपोर्टिंग की जाती है। ]

“विवादहीन ग्राम योजना”  का उद्देश्य ग्रामीण विवादों का आपसी सुलह-समझौते से निराकरण करने के साथ ही अपने विधिक अधिकारों के प्रति ग्रामवासियों को जागरूक एवं सशक्त करना भी है, तभी सही मायने में ग्राम-स्वराज्य की कल्पना वास्तविक रूप धारण कर सकती है। 

साथ ही, सेवानिवृत अधिकारी एवं गाँधीवादी पालीवाल जी ने लोक अदालत का जिक्र करते हुए अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि अब तक मध्य प्रदेश राज्य के ५० जिलों के १८० गाँव विवाद-विहीन घोषित हो चुके हैं। साथ ही, यह एक सुखद अनुभूति ही है कि मध्य प्रदेश विधिक सेवा प्राधिकरण  के सहयोग से राज्य के पैरालीगल वॉलेन्टियर्स एवं अन्य न्यायिक अधिकारी कोरोना मुक्त अभियान में अपनी भूमिकाएँ दर्ज़ करा रहे हैं। 

साथ ही, उन्होंने कहा कि यदि ग्राम स्वराज्य एवं कोरोना संकट से निपटने के आपसी गठजोड़ के निहितार्थ का मूल्यांकन करने हेतु यह आवश्यक है कि भारतीय ग्रामीण व्यवस्था को सक्षम, सशक्त एवं विकेन्द्रीकृत करते हुए विकास का एक सुदृढ़ आधार दिया जाये।  इसी दिशा में, स्थानीय स्तर पर ही सभी ग्रामीणों को कम लागत एवं विभिन्न हितधारकों के पारस्परिक सहयोग के माध्यम से रोजगारपरक शिक्षा, स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति , सामुदायिक साफ-सफाई , जल एवं पर्यावरण संरक्षण एवं सुरक्षा आदि की उपलब्धता सुनिश्चित किये जाने की नितांत आवश्यकता है।

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इस व्याख्यान के अगले क्रम में, डॉ आरके पालीवाल ने पीपीटी का प्रस्तुतिकरण द्वारा ग्राम स्वराज्य की दिशा में अपने निजी प्रयासों की कई बेमिसाल जानकारियाँ साझा कीं। डॉ आरके पालीवाल ने विशेष तौर पर आदर्श ग्राम की योजना का भी उल्लेख किया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने भारतीय ग्रामीण समाज का  कोरोना के परिपेक्ष्य में एवं गाँधीजी की ग्राम स्वराज्य का विश्लेषण करते हुए सर्वप्रथम यह कहा कि भारत सरकार की कोरोना योजना अपने आरम्भिक चरणों में पूर्णत: असफल रही थी क्योंकि यह बहुत हद तक केवल केंद्रीकृत निंर्णयों एवं सेवाओं द्वारा ही संचालित हो रही थीं।  उदाहरण के लिए – रेमडेसिविर नामक एंटी-वायरल दवा की आपूर्ति भी केवल केंद्र सरकार द्वारा ही मिल पा रहा था, गाँव वाले तो इस दवा की पहुँच से काफी दूर थे।

 इस तरह से ग्रामीण आबादी का एक बड़ा तबका त्रुटिपूर्ण सरकारी नीतिगत फैसलों की वजह से  अपने परिजनों के लिए दवा खरीदने के अधिकार  से वंचित रही थी। साथ ही, लॉकडाउन की अनियोजित व्यवस्था एवं वैक्सीन की प्रक्रिया के केन्द्रीकृत स्वरुप ने भी ग्राम स्वराज्य की परिकल्पना के बिल्कुल विपरीत परिचय दिया।

गाँधीजी के ग्राम स्वराज्य की प्रकृति का वर्तमान राष्ट्रीय परिवेश में विवेचन करते हुए डॉ आरके पालीवाल ने कहा कि ग्राम पंचायत जैसी निकायों को जड़ से मजबूत किये जाने की जरुरत है ताकि वे स्वशासन के क्रम में पूर्ण निर्णय  लेने में स्वतंत्र हो तथा  योजनाओं की दिशा में वे जनसहभागिता को भी तय कर सकें। यह विडंबना ही है कि आज तक भारतीय योजनाओं के निर्माण के क्रम में, कभी भी  ग्रामीण जनता को अपने समस्याओं को सही मायने में प्रस्तुत करने या अपना मत रखने  का अवसर नहीं प्रदान किया गया है।

आगे उन्होंने, यह भी सुझाव दिया कि हमें भारतीय गाँवों की भौगोलिक संरचनाओं के अंतर्गत मिट्टी ,जलवायु एवं अन्य विवधताओं जैसे कि प्राकृतिक एवं आर्थिक संसाधनों (कृषि एवं पशुधन) आदि का भी आकलन करते हुए ग्रामीणों  की स्वायत्तता का पहल किया जाना चाहिए।  साथ ही, उन्होंने सरकारी प्रयासों की दुर्बलता का उल्लेख करते हुए दर्शाया कि कैसे ग्राम स्तर पर इस वैश्विक महामारी के मद्देनज़र जनजागरूकता अभियान में अकर्मण्यता पेश की गयी।

जबकि इस विकट परिस्थिति में, ग्राम स्तर पर व्यापक तौर पर इस महामारी से सम्बंधित सभी पहलूओं पर जागरूकता अभियान का सुचारुपूर्ण नेतृत्व किया जाना चाहिए था। इसी क्रम में,  डॉ  पालीवाल ने बताया कि कैसे उन्होंने अपने टीम के माध्यम से विभिन्न राज्यों में  स्वयंसेवकों को जन जागरूकता कार्यक्रम चलाने हेतु प्रशिक्षित किया और यह भी सुनिश्चित किया कि ग्रामीणों को उनकी स्थानीय भाषा एवं बोली में ही मार्गदर्शित किया जाये ताकि वे इस वैश्विक आपदा की गंभीरता को आसानी से समझते हुए अपने को मानसिक रूप से तैयार रखते हुए स्वयं तथा अपने समाज व समुदायों को सुरक्षित रख सकें।

डॉ आरके पालीवाल ने  अपनी वार्ता के अगले पड़ाव में , बताया कि कैसे गाँधीजी  हिंदी भाषा के माध्यम से ही पूरे देश में जनसम्पर्क का सूत्र पिरोरना चाहते थे, इसी क्रम में, वे एक नयी अवधारणा “नई तालीम” अर्थात् दुनियावी शिक्षा का भी प्रमुखता से उल्लेख करते हुए रोज़गारपरक शिक्षा की वकालत  करते हैं।

गाँधीजी का मानना था कि भारतीय ग्रामीण समाज की तात्कालिक पीढ़ी को ऐसी शिक्षा प्राप्त हो जिससे वे स्वयं रोजग़ार सृजन करते हुए आत्मनिर्भरता का परिचय दे एवं अपने विकास के पथ का निर्माण खुद तय करें ताकि उन्हें शहरों पर कम-से -कम नज़र दौड़ानी पड़ें। इसी क्रम में, गाँधीजी ने सांप्रदायिक सद्भाव को भी ग्रामीण उन्नति की दिशा में एक आवश्यक कुँजी माना। ध्यातव्य है कि गाँधीजी “महानगरों को मानव-सभ्यता का प्लेग” कहते  थे। 

यहाँ ,पालीवाल जी ने वर्तमान महामारी की विभीषिका का जिक्र करते हुए  इंगित किया कि कैसे महानगरों में प्रवासी श्रमिकों को कोरोना काल में विकराल परिस्थितयों में गाँवों का रुख लेना पड़ा जो कि एक तरह से नगरीय स्वार्थ का बड़ा ही विद्रूप तस्वीर पेश करता है, जिसके तहत तथाकथित ग्रामीण मजदूरों को शहरों में शरण भी नहीं मिला था। यद्यपि यह भी सच है कि इस वैश्विक महामारी के देश में वाहक नि:संदेह समाज के उच्च मध्यवर्गीय नागरिक ही थे, जिन्होंने हवाई-यात्राओं के माध्यम से कोरोना के आँकड़ों में वृद्धि हेतु अपनी प्रमुख भूमिका अदा की। 

लेकिन इसके विपरीत हमने इस कोरोना काल में यह भी देखा कि शहरों के मुकाबले भारतीय ग्रामीणों की रोग -प्रतिरोधक क्षमता कई मायनों में प्रबल थी , जिसका कारण वहाँ की प्रकृति प्रदत सम्पदा  तथा  प्राण वायु कहे जाने वाले ऑक्सीजन से भरपूर हरे-भरे वनों व पेड़ों को जाता है। संक्षेप में, भारतीय गाँवों में अपने विकास के बीज़ खुद में ही अंतर्निहित हैं, अतः भारतीय  ग्रामीण यदि चाहे तो अभी भी अपने परिवेश को मजबूत बना सकते हैं। 

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अपने वक्तव्य के इस पायदान में , डॉ आरके पालीवाल ने रिवर्स माइग्रेशन को एक समस्या के तौर पर न लेकर इसे चुनौती में एक अवसर  के रूप में लेते हुए इसका सदुपयोग करते हुए ग्रामीण स्वराज्य की दिशा में कई युगांतकारी प्रयास किये जाने की आवश्यकता है।[ यहाँ, रिवर्स माइग्रेशन से तात्पर्य ‘महानगरों और शहरों से गाँव एवं कस्बों की ओर होने वाले पलायन से है।

’ जैसा कि हमने विगत वर्ष देखा कि कैसे एक बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिकों का गाँव की ओर प्रवासन हो रहा था, खास तौर पर  लॉकडाउन के कुछ दिनों बाद ही काम-धंधा बंद होने की वजह से श्रमिकों का बहुत बड़ा हुजूम हजारों किलोमीटर दूर अपने घर जाने के लिये पैदल ही सड़कों पर उतर पड़ा था ।]

उन्होंने रिवर्स माइग्रेशन द्वारा गाँधीजी के ग्राम स्वराज्य के सुखद कल्पना को साकार करने में एक युक्ति की तरह पुष्टि करने की दिशा में  अपने कुछ बहुमूल्य सुझाव भी दिए। जैसे कि यह ग्रामीणों के प्रगति एवं उत्थान के लिए ही अपरिहार्य संकेत है कि प्रवासी श्रमिक अपने गाँवों -कस्बों में रह जाएँ तथा विभिन्न  ग्रामोद्योगों को अपनाये, इसके लिए यह जरुरी है कि सरकार द्वारा भी ग्रामीण व स्थानीय स्तर पर वहीं के प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग करते हुए उन ग्रामीणों को बुनियादी सुविधाएँ [बिजली,शिक्षा,इंटरनेट] एवं  कंप्यूटरीकृत प्रशिक्षण प्रदान कर जैविक खेती अथवा रोजगार के अन्य साधन उपलब्ध कराये जाएँ और ग्रामीण समुदाय को सशक्त एवं आत्मनिर्भर बनाया जा सकें।

इसी क्रम में, डॉ आरके पालीवाल ने विभिन्न राज्यों में संपन्न किये गए अपने प्रयासों का जिक्र करते हुए बताया कि कैसे केवल सामुदायिक प्रयासों एवं ग्रामीणों के श्रमदान द्वारा आदिवासी गाँवों का पुनरुत्थान करते हुए उन्हें आदर्श ग्राम की संज्ञा प्रदान की गयी। इसका फायदा यह हुआ कि विभिन्न कार्यों जैसे कि जल -संरक्षण एवं वृक्षारोपण आदि में ग्रामीणों को वित्तीय स्वायत्तता केमहत्ता का भी अनुभव क्योंकि अधिकतर कार्य बच्चों एवं महिलाओं के निःशुल्क श्रमदान का परिणाम था और इसमें यह भी निश्चित किया गया था कि ऐसे ग्रामीण कार्यों में अधिकारियों के हस्तक्षेप  को वरीयता प्रदान नहीं की जाएगी।

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इस व्याख्यान के प्रमुख चर्चाकर्ता – डॉ सुरेश गर्ग,( संस्थापक, गांधी सुमिरन मंच, विदिशा; पूर्व में स्वास्थ्य विभाग, मध्य प्रदेश के साथ; कोरोना मुक्त गांव मिशन; डॉक्टर और वयोवृद्ध गांधीवादी) ने सबसे पहले इम्प्री टीम को इस वेबिनार के विषय को  वर्तमान परिस्थितियों के लिए सर्वथा उपयुक्त बताते हुए धन्यवाद एवं आभार प्रकट किया।

उनकी चर्चा के कुछ मुख्य बिंदु इस प्रकार थे :

१. अपने कोरोना मुक्त गाँव एवं कोरोना मुक्त भारत अभियान का ज़िक्र करते हुए कहा कि उनके टीम के प्रयासों का सुखद परिणाम यह हुआ कि समाज में कोरोना काल की शुरुआती दौर में लोगों के बीच इस वैश्विक महामारी के प्रति जो एक तरह का  भय एवं भेदभाव व्याप्त था – उन सबके बीच उम्मीद की किरण जगी।

२. साथ ही, उन्होंने बताया कि कैसे उनके टीम ने जनमानस की सुलभता हेतु हिंदी और सभी भारतीय भाषाओं में कोरोना से संबंधित स्वास्थ्य संबंधी दिशा-निर्देश उपलब्ध कराये।

३. इसी संदर्भ में, केवल  दो  ही देश के ५० गाँवों को अपनी संस्था के माध्यम से जोड़ा गया।  साथ ही, कोरोना महामारी एवं इसके टीकाकरण से जुड़ें भ्रामक जानकारियों को दूर करने की दिशा में वेबिनार के द्वारा जनजागरूकता के प्रयास किये गए।

४.  संक्षेप में, डॉ सुरेश गर्ग ने ग्राम स्तर पर सरकार की कोविड के संबंध में किये प्रयासों विशेषकर- आँगनवाड़ी कार्यकर्ताओं एवं एएनएम आदि की कोरोना महामारी के परीक्षण एवं इससे जुड़ें जागरूकता अभियान में उनकी भूमिका की सारगर्भिता पर सवाल उठाते हुए अपनी चिंता व्यक्त की। जैसा कि विदित है कि महिला स्वास्थ्यकर्मी समाज के निम्न वर्गों से आती हैं , आज भी ये घूघँट का पालन करती हैं।

वहीं यदि अन्य फ्रंट वारियर के तौर पर कार्यरत निम्न वर्ग के पुरुष की भी बात करें तो हम पाते  हैं कि भारतीय ग्रामीण समाज में वे आज भी उच्च वर्गों के सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं कर पाता क्योंकि जाति व्यवस्था व्यापक पैमाने पर मौजूद है। इस तरह,यह सामाजिक अंतर  भी कोरोना महामारी के निपटने के क्रम में एक चुनौती ही है।

५. अंत में, उन्होंने कहा कि भारतीय गाँवों में सत्ता का केन्द्रीकरण इतना ज्यादा है कि उन्हें कई बार [झापखेड़ा गाँव का निजी अनुभव ] ग्रामीण विकास एवं पुनरुत्थान के कार्यों में कई स्तरों पर प्रशासनिक अधिकारियों के बेबुनियादी हस्तक्षेपों एवं अकर्मण्यताओं का सामना करना पड़ा [जबकि अधिकतर कार्यों का संपादन सामुदायिक प्रयासों द्वारा स्थानीय स्तर पर कर लिया गया था ], जिसके कारण इन कार्यों को अनावश्यक विलंब का सामना करना पड़ा। 

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इस व्याख्यान में, आगे एक बार फिर डॉ आरके पालीवाल ने मुख्य रूप से दो बातें जोड़ते हुए कहा कि कैसे भारतीय ग्रामीण समाज में व्याप्त वर्णभेद एवं छुआछूत जैसी सामाजिक कुरीतियां  कई बार गाँधीजी के ग्राम स्वराज्य की संकल्पना को पूर्ण करने में बाधक साबित हुई  हैं। इस संदर्भ ने उनके निम्नांकित विचार थें   –

१. डॉ पालीवाल ने कहा कि हालाँकि कई गाँवों में उपरोक्त वर्णित कुप्रथाएँ आज समाप्त हो गयी हैं क्योंकि देश में इन के निवारण कानून  [अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955 एवं अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989] क्रियान्वित हैं। लेकिन यह भारतीय ग्रामीण समाज का अपयश ही है कि अब भी देश के सुदूर ग्रामीण इलाकों में उक्त वर्णित कानूनों का व्यवहार में पालन नहीं किया जाता। अतः यहाँ  सरकार मूकदर्शक की भूमिका का निर्वहन करती है।

इस संदर्भ में, यदि गाँधीजी के दृष्टिकोण को यदि अपनाया जाये , जिसमें वे समाज के सजग नागरिकों को अपने कर्तव्यों का हवाला देते हुए इन सामाजिक मुद्दों को तात्कालिक भारतीय समाज से निकाल बाहर करने की अपील करते हैं। यहाँ यह जानना रोचक होगा कि गाँधीजी ने १९३२-३३ के दौरान “हरिजन यात्रा’ नामक आंदोलन पूरे देश में संचालन किया था एवं हरिजन फण्ड भी इकट्ठा किया था ताकि अत्यंजों के कल्याण में इसका उपयोग किया जा सकें।   

२. इसी संदर्भ तथा ग्राम स्वराज्य के क्रम  में, गाँधीजी के यह कथन  प्रासंगिक सिद्ध होता है – “गाँव में नाली भी बनानी है और कीचड़ भी खत्म करना है ।”  इस कथन का तात्पर्य ग्रामीण स्वावलम्बन एवं आत्मनिर्भरता से समझा जा सकता है।

३. साथ ही, भारतीय ग्रामीण व्यवस्था को सुढृढ़ करने हेतु यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि प्रशासनिक अधिकारियों के हस्तक्षेप से किसी योजना के क्रियान्वयन में होने वाली देरी एवं विभिन्न ग्रामीण जनप्रतिनिधियों के सरकारी- निधि से सम्बद्ध  वित्तीय आवंटन की समस्या से जनित  मौद्रिक चुनौतियों इत्यादि को यथाशीघ्र समाप्त कर, वास्तविक रूप में – स्थानीय ग्रामीण निकायों को अपने गाँव की  कार्ययोजना संबंधी निर्णय लेने एवं वित्तीय स्वायत्तता आदि के अधिकार सुनिश्चित किये जाये।

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इसके पश्चात्, इम्प्री टीम के डॉ अर्जुन कुमार ने डॉ आरके पालीवाल ने प्रश्न किया -जैसा कि ज्ञात है भारतीय ग्रामीण व्यवस्था एवं इतिहास के अंतर्गत महात्मा गाँधीजी एवं बाबा भीम राव अंबेडकर दोनों में दलित-बहुजन राजनीति पर भी  कई मतभेद रहे हैं, इसे आप २१ वीं सदी के भारत के संदर्भ में किस तरह देखते हैं -आपके क्या विचार हैं?

उपरोक्त प्रश्न का उत्तर,डॉ पालीवाल ने  अपने सारगर्भित अंदाज में प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह बिल्कुल सत्य है कि इन दोनों महापुरुषों में गाँवों को लेकर वैचारिक मतभेद रहे थे, पर इस क्रम में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि दोनों के समक्ष निजी जीवन के कई कटु एवं सार्थक अनुभव थे , जिसपर वे अडिग थें।

ज्ञातव्य है कि अंबेडकर ने अपने बाल्यावस्था से लेकर अपने सम्पूर्ण जीवनयात्रा के दौरान छुआछूत व सामाजिक बहिष्करण की कुप्रथाओं का आघात स्वयं तथा अपने परिजनों , पड़ोसियों  आदि जीवन में कई बार महसूस किया था।  इस अर्थ में, वे अस्पृश्यता के रिवाज़ को भारतीय गाँवों की अपेक्षा देश के शहरों में कम अनुभव किया।

यह भी विश्लेषण किया जाना आवश्यक है कि उनकी शिक्षा-दीक्षा बहुतायत शहरी व पाश्चात्य परिवेश में हुई थीं, अतः यहीं कारण था कि वे वहाँ के आधुनिक विचारधारा[उनपर विशेष तौर पर अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम एवं फ्रांसीसी राज्य क्रान्तिआदि का  गहरा प्रभाव  रहा था ], सभ्यता-संस्कृति के क्रम में शहरीकरण एवं औद्योगीकरण आदि से अत्याधिक प्रभावित थें।

वहीं, अगर गाँधीजी के ग्राम स्वराज्य की बात करें तो यह कहा जाता है कि राष्ट्रपिता का विश्वास रहा कि  भारतीय समाज में यदि सत्ता का हस्तांतरण उच्च जमींदार वर्ग के हाथों में केंद्रित हो जाती है तो इससे अत्यंज वर्ग को सदा अभावग्रस्तता  में जीवन व्यतीत करने  के लिए बाध्य होना पड़ेगा, अतः एक संतुलित व्यवस्था के तहत स्वराज्य की अवधारणा की नींव रखनी होगी जो कि व्यवहार्यता  में भी सामाजिक-आर्थिक शोषण से रहित हो।

आगे, डॉ आरके पालीवाल ने कहा कि यदि हम संविधान में प्रावधानित “पंचायती व्यवस्था” के उपबंधों को ही देखें तो गाँधीजी एवं अम्बेडकर के बारे यह जानकारी भी मिलती है कि ग्राम प्रशासन को लेकर -इन दोनों में इतने कटु मतभेद नहीं थे।  साथ ही, प्रमुख वक्ता ने अपनी  स्वरचित पुस्तक “अम्बेडकर: जीवन और विचार” का हवाला देते हुए इस बात की पुष्टि किया और कहा कि समाज के कुछ तथाकथित राजनैतिक दल अपनी सत्ता लोलुपता एवं अदूरदर्शिता के कारण इन दोनों महानायकों  में वैचारिक मतभेद की बात करते हैं , जबकि इन दोनों में कई समानताएँ थीं -जिसका प्रमाण इस बात से मिलता है कि ये दोनों ने कई मुद्दों पर एक-दूसरे के विचारों की सराहना भी की है। 

यहाँ,  डॉ पालीवाल ने विशेष तौर से उल्लेख किया कि चूँकि किसी भी आलोचक के लिए  किन्हीं भी दो मशहूर हस्तियों की असहमतियों को उजागर कर उनमें मतभेद  दर्शाना  आसान उपलब्धि होती है, अतः इस अर्थ में भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में यह भ्रम अबतक बना हुआ है।

जबकि यहीं सच है कि गाँधीजी एवं अंबेडकर -दोनों अपनी अंतरात्मा से छुआछूत की प्रथा के विरोधी थे।  बस दोनों के विचारों के निष्पादन की प्रक्रिया में अन्तर था – जहाँ गाँधीजी ने अस्पृशयता को भारतीय समाज से दूर करने के लिए उच्च वर्गों से हृदय परिवर्तन की अपील करते हुए उन्हें  सत्याग्रह के माध्यम से हरिजन -बंधुओं को सम्मिलित करने की सलाह दीं। वहीं, दूसरी ओर अम्बेडकर जी ने यह सामाजिक परिवर्तन की इस धारा को कानून रूपी हथियार से प्रवाहित करने के लिए अडिग थें। इस संदर्भ में , उपरोक्त दोनों विचारकों की  सैद्धांतिक पहलों का मूल्यांकन करें तो हम पाते हैं कि ये दोनों सामाजिक पुनरुत्थान की दिशा में विफल रहे। 

डॉ पालीवाल जी ने उपरोक्त वर्णित तर्कों के आधार पर कहा कि यदि हम सही मायने में भारतीय समाज के विकास हेतु शुभेक्छु है तो हमें गाँधीजी एवं अंबेडकर जी -दोनों की बराबर जरुरत है।  अतः,  वर्तमान दौर में  दोनों के विचारों तथा  सिद्धांतों को साथ लेकर सामाजिक उत्थान की दिशा में, एक मिश्रित वार्ता की पहल करने की नितांत आवश्यकता है।

 व्याख्यान के अगले पायदान पर, इम्प्री टीम के डॉ अर्जुन कुमार ने डॉ पालीवाल जी से एक अन्य सवाल किया – पिछले दो दशकों से देखा जा रहा है कि काफी महिलाएँ श्रमशक्ति से आगे बढ़ चुकी  हैं क्योंकि आजकल आकांक्षी युवा समाज बनता जा रहा है।  अतः इस बढ़ते सामाजिक बदलाव या प्रचलन के बारे में आपकी क्या राय है ?

उपरोक्त प्रश्न का उत्तर हमारे आज के प्रमुख वक्ता ने बड़े ही प्रसन्नचित्तता के साथ दिया-

उन्होंने कहा कि यहाँ  हमें भारतीय राजनीति एवं स्वतंत्रता संघर्ष में गाँधीजी के योगदानों को स्मरण  करने की आवश्यकता है।  ज्ञातव्य है कि गाँधीजी ने ही सबसे पहले भारतीय समाज में महिलाओं की  बराबरी की बात किया था और दक्षिण अफ्रीका से देश में वापस आने के पश्चात्  विशेष तौर पर बिहार राज्य के “चम्पारण सत्याग्रह” के दौरान, उन्होंने  यह महसूस किया कि भारतीय ग्रामीण समाज की  आधी आबादी “महिलाओं” की थीं जो कि केवल घरों में ही अपना जीवन व्यतीत कर रही थीं और उनका ग्राम विकास में भी कोई प्रतिनिधित्व नहीं था क्योंकि तत्कालीन सामाजिक परिदृश्य में भयंकर पर्दा प्रथा प्रचलित थीं।

अतः, गाँधीजी ने  ग्रामीण सामाजिक विकास के मार्ग को अवरुद्ध करने वाले उपरोक्त वर्णित तत्व को जड़ से मिटाने की दिशा में अपनी धर्मपत्नी “माता कस्तूरबा ”  को महिलाओं के सशक्तिकरण हेतु आगे बुलाया ताकि उन ग्रामीण महिलाओं को सत्याग्रह की राह पर चलते हुए रचनात्मक कार्यों का प्रशिक्षण आदि देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जाएँ। गाँधीजी के इस प्रयास को ही “नई तालीम” की अवधारणा के रूप में चिन्हांकित किया जाता है जो ग्राम स्वराज्य की दिशा में सार्थक पहल थी।

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इस व्याख्यान की अगली कड़ी में, डॉ संजय सिंह, (सचिव, परमार्थ समाज सेवी संस्थान, उत्तर प्रदेश; बुंदेलखंड के वाटरमैन; राज्य समन्वयक, उत्तर प्रदेश, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) ने सर्वप्रथम वार्ता के इस विषय की सराहना करते हुए कहा कि उक्त विषय मन  को तसल्ली देने वाला है। 

साथ ही, इम्प्री टीम को  इस पहल के माध्यम से कोरोनाकाल में गाँधीजी के विचारों की प्रासांगिकता को सँभालने हेतु   प्रशंसा और बधाइयाँ दीं। इसी संदर्भ में, उन्होंने कहा कि हमलोगों ने तो पूज्य गाँधीजी के जीवन को केवल पढ़ा , जबकि “डॉ. पालीवाल” जी  तो उनके आदर्शों को सम्पूर्णता में पालन करते हुए जीवंत किया  है। इसी संदर्भ में कहा कि गाँधीजी के दर्शन के अध्ययन के उपरांत पूरे ब्रह्मांड में अन्य कोई महत्वपूर्ण दर्शन की बानगी नहीं मिलती ।

आगे, अपने विचारों को व्यक्त करते हुए कहा कि  यदि हम सब गाँधीजी के “हिन्द स्वराज्य” में निर्देशित  सिद्धांतों की तर्ज़ पर  अपना जीवन न्यूनतम आवश्यकताओं में व्यतीत करना शुरू कर दें , तो नि:संदेह हमारे समाज से आधे से अधिक भ्रष्टाचार , बेईमानी एवं कदाचार आदि बुराईयों का समापन निश्चित है।  यदि कोरोनाकाल में भारतीय गाँवों की स्थितियों का आकलन करें तो हम पाते हैं कि यह वैश्विक महामारी एक तरह से ग्रामीण व्यवस्था में कम प्रभावशाली रहा।  जिसका एक प्रमुख कारण – ग्रामीणों की विकट परिस्थितियों में डटे रहने की जिजीविषा ही थी। अत:, इसी क्रम में ग्रामीणों  ने अपनी कर्मठता  व सहिष्णुता का असाधारण परिचय देते हुए अपनी उचित जीवनशैली व दिनचर्या के बलबूते कोरोना के प्रहार से अपने ग्रामीण समाज को दूर रखा। 

उन्होंने यह भी बताया कि इस संदर्भ में हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि कैसे ग्रामीणों ने अपनी आर्थिक व्यवस्था में मितव्ययिता एवं श्रम -विभाजन के सिद्धांतों को व्यवहार में लाकर,  गाँधीवादी अर्थशास्त्र की संकल्पना को आज भी कायम रखा है।  इसी क्रम में, यह एक विचारणीय तथ्य है कि  कोरोनाकाल में देश की  सरकार के पास इतनी क्षमता नहीं थी कि वे  ७०%ग्रामीण आबादी को स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान कर पाते , यह तो सिर्फ़ ग्रामीणों की ईश्वर पर अटूट आस्था, आपसी भाईचारा एवं सूझ-बूझ का युगांतकारी परिणाम था कि वे इस आपदा में खुद पर नियंत्रण प्राप्त कर पाये।

आगे चर्चा में , डॉ संजय सिंह ने कहा कि कोरोना काल में भारतीय गाँवों में एक अलग ही आध्यात्मिक दर्शन देखने को मिला , जैसे कि लोगों ने आपसी डॉ संजय सिंह आपसी लड़ाई व रंजिशें भूलाकर अपने ग्राम-देवता की मिलजुलकर पूजा-अर्चना की। उन्होंने यह भी कहा कि गाँधीजी  के दर्शन की वास्तविक तस्वीर आज भी गाँवों में देखने को मिलती है , जैसे कि ग्रामीण अपने श्रमदान से तालाब एवं अन्य निर्माण कार्यों में अपना पसीना निकालते हुए सदा  स्वावलंबन का  परिचय देते हैं।

साथ ही ,  डॉ सिंह ने शहरी संस्कृति की आलोचना करते हुए कहा कि नगरों में गाँधीजी के दर्शन को केवल एक नुमाइश की वस्तु समझा जाता रहा, जो कि किन्हीं विशेष अवसरों पर  वहाँ की वैचारिक मंचों एवं पुस्तकालयों की सुंदरता में चार-चाँद लगाने का एक जरिया मात्र प्रतीत होते हैं।

यह भी सत्य है कि गाँवों में बाज़ार आधारित व्यवस्था है, लेकिन फिर भी आज भी ग्रामीण अपनी जरूरतों को पूर्ण करने के क्रम में आत्म -निर्भरता का परिचय देते हुए गाँधी के दर्शन को जीवंत रखा है।  अतः यहाँ हमें ग्रामीणों से श्रम की महत्ता की सीख लेने की जरुरत है जो कि कहीं-न-कहीं कोरोना की तीसरी लहर से लड़ने में हमारे लिए कारगर सिद्ध होगा।

डॉ सिंह ने बुंदेलखंड के क्षेत्रों के  निजी अनुभवों को हवाला देते हुए इस बात की पुष्टि की कि कैसे ग्रामीण अपनी जरूरतों के लिए स्थानीय स्तरों पर ही खेती-बाड़ी कर कई वर्षों से अपना जीवन बड़ी ही सरलता से व्यतीत कर रहे हैं। इसी चर्चा के क्रम में, उन्होंने कहा कि ग्रामीणों को स्वच्छ प्राण या श्वास वायु के लिए शहरों की भाँति योग दिवस आदि का ताम-झाम नहीं करना पड़ता क्योंकि ग्रामीण परिवेश में उन्हें सर्वदा नि:शुल्क एवं पर्याप्त मात्रा में शुद्ध वायु हरे-भरे पेड़ों की भरमार से मिलती है जो कि ऑक्सीजन के एक विशाल भंडार ही हैं।

दूसरे शब्दों में, डॉ सिंह ने कोरोना काल में ग्रामीण व्यवस्था में दिन-प्रतिदिन अपनाये जाने वाले क्रियाकर्मों का हवाला देते हुए [मसलन- श्रमदान, न्यूनतम व्यय में जीवन बसर करना , भोजन का अपव्यय न करना , घरेलू व औषधीय नुस्खे की बदौलत एक मजबूत रोग-प्रतिरोधक क्षमता की प्राप्ति करना आदि ] बताया कि कैसे ग्रामीण समुदाय खुद को कोरोना के  तीसरी लहर की आघात से बचने की प्रतिबद्ध है और इसी क्रम में, टीकाकरण एवं अन्य सुरक्षात्मक उपायों को भी अपना रहा है।

अपने वक्तव्य के अंत में, विशेष तौर पर डॉ संजय सिंह ने अपने कार्यक्षेत्रों में टीकमगढ़, छतरपुर,झाँसी, ललितपुर, जालौन , हमीरपुर आदि स्थलों में ग्रामीणों के कठिन श्रम एवं कम अपव्यय करने की आदतों की सराहना की। साथ ही, इन्हें गाँधी- दर्शन की सफलता का द्योतक मानते हुए तथा ग्रामीण जीवटता को इस वैश्विक आपदा से निपटने के निहितार्थ  में अत्यंत उपयोगी घोषित किया।   

व्याख्यान के अगले चरण में, डॉ पालीवाल जी ने अपने १०-१५ सालों के कार्यानुभवों को साझा करते हुए गाँधीजी के ग्राम स्वराज्य पर विकसित “आदर्श गाँव” में किये गए रचनात्मक कार्यों की जानकारी दी कि कैसे वहाँ की ग्रामीण आबादी ने केवल अपने कर्मठ प्रयासों एवं स्वास्थ्य के प्रति अपने जागरूक रवैये से कोरोनाकाल में किसी प्रकार से हताहत न होते हुए  खुद को बचा पायी। यहाँ, एक बात ध्यान देने योग्य है कि ये सभी आदर्श गाँव मूलत: आदिवासी बहुल इलाकों में विद्यमान हैं, जहाँ स्वास्थ्य की बुरी स्थितियाँ बड़े पैमाने पर मिलती हैं[जैसे कि महिलाओं में एनीमिया की शिकायत , बच्चों का विकास अवरुद्ध होना, नौजवानों में बूढ़ेपन की समस्या आदि।  ]।

यहाँ डॉ पालीवाल ने बताया कि कैसे हमने कोरोना काल में इन गाँवों को संक्रमण रहित रखने के लिए एक स्पष्ट रणनीति तैयार कर उसकी दिशा में पहल किए। जैसे कि अपने सहयोगी-मित्रों आदि के साथ मिलकर इन क्षेत्रों में भोजन में प्रोटीन की मात्रा को उपलब्ध करने हेतु चने की खेती को बढ़ावा दिया। 

साथ ही, गाँव एवं शहरों के बीच कम संपर्क स्थापित करने के लिए शहरों में लगने वाले साप्ताहिक हाट को नियंत्रित कर अनावश्यक आवाजाही को रोकने का प्रयास किया गया। साथ ही, उन्होंने विभिन्न इलाकों में ग्रामीण महिलाओं, नवयुवकों  एवं अन्य गाँधीवादी संस्थाओं आदि के प्रयत्नों की भी तारीफ़ की और कहा कि कैसे उन्होंने सोशल डिस्टेंसिंग एवं संक्रमण को रोकने हेतु स्थानीय स्तर पर ही सावधानियाँ को अपनाया।  इस क्रम में, अपने गाँवों की सीमा पर ही   बैरिकेडिंग एवं आइसोलेशन सेंटर की व्यवस्था कर दिया था, जिसके कारण गाँवों को संक्रमण से बचाया जा सका।

आगे, उन्होंने कोरोना काल में ग्रामीण जागरूकता एवं वहाँ की स्वास्थ्यवर्द्धक आबोहवा एवं घरेलू चिकित्सीय उपचारों आदि को रोग प्रतिरोधक क्षमता से लड़ने में कारगर माना।  साथ ही, देश के अन्य राज्यों – उत्तर प्रदेश एवं बिहार में गंगा नदी में बहाये गए अनगिनत लाशों के वीभत्स दृश्यों का ज़िक्र करते हुए चिंता भी व्यक्त की।

अपनी वार्ता की महत्वपूर्ण कड़ी में,उन्होंने  इस वैश्विक आपदा में विशेष तौर पर व्यथित वर्ग- “प्रवासी श्रमिकों एवं उनके परिवारों” के संबंध में सुझाव देते हुए कहा कि सभी राज्य सरकारों को अनिश्चितता की इस घड़ी में  उन्हें सबलता प्रदान करने की जरुरत है तभी सही मायने में हम गाँधीजी के ग्राम स्वराज्य की संकल्पना को चरितार्थ कर सकते हैं।

जैसे कि- ग्रामीण व स्थानीय स्तर पर ही सरकारी प्रयासों से उनके लिए रोजगार के साधन उपलब्ध कराया जाये, जैविक कृषि को बढ़ावा दिया जाया एवं अन्य सुविधाओं के अन्तर्गत इंटरनेट सेवा का प्रदान किया जाना [चूँकि,  प्रवासी श्रमिकों के लगभग ८-१० वर्षों से महानगरों में रहें , अतः इनके बच्चे  शहरी जीवन के आदी हो जाते हैं ] इत्यादि।

इस अर्थ में, यह भी विचारणीय पहलू है कि उपरोक्त वर्णित  प्रयासों को साकार करने की दिशा में ग्रामीण संस्कृति की अक्षुण्णता एवं मौलिकता की निरंतरता बाधित न हो। अन्य शब्दों में, हम गाँवों को शहर बनाने की कोशिश न करें। डॉ पालीवाल ने दृढ़ता से कहा कि हमें ऐसे स्मार्ट गाँव नहीं चाहिए जो कि पेड़ों को काटकर केवल कंक्रीट की संरचना मात्र हो।

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  डॉ पालीवाल ने ग्रामीण संसाधनों का उपयोग कर  बागवानी एवं कृषि से सम्बन्धित ग्रामोद्योगों की स्थापना को ही ग्राम स्वराज्य की सफलता की दिशा में जरुरी प्रयास माना। साथ ही, गाँधीजी द्वारा सुझाये गए रचनात्मक कार्यों को ही ग्रामीण व्यवस्था में लागू कर ही गाँवों को विकसित  करते हुए ग्राम स्वराज्य को समकालीन परिस्थितियों में वास्तविक अर्थों में धारण किया जा सकता है।  

अतः ग्राम स्वराज्य की प्राप्ति की दिशा में दीर्घकालिक लक्ष्य होना चाहिए, साथ ही इन्हें सत्ता के केन्द्रीकरण से भी दूर रखा जाना चाहिए। यही वजहें हैं कि वर्तमान में देश के कुछ गाँव अपने प्राकृतिक स्वरुप में अब भी सुरक्षित एवं जीवंत हैं। 

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वार्ता के क्रम में, इम्प्री टीम की सदस्या सुश्री निशि वर्मा ने मुख्य वक्ता “डॉ पालीवाल” से यह पूछा कि गाँवों में कोरोना के टीकाकरण की वास्तविक स्थिति – जागरूकता के मामले में अथवा यूं कहें कि वैक्सीनेशन की स्वीकार्यता ग्रामीणों में  कितनी हैं?

इस प्रश्न का जवाब डॉ पालीवाल ने अपने चिरपरिचित अंदाज में देते हुए कहा कि नि:संदेह राज्य सरकारों ने तीसरी लहर को ध्यान में रखते हुए ग्रामीण स्तर पर ग्राम सभाओं एवं ग्राम पंचायतों के माध्यम से सक्रिय भूमिकाएँ निभायी हैं, किंतु अभी और अधिक प्रयास एवं सतर्क होने की आवश्यकता है।

इसी क्रम में, उन्होंने बताया कि जनजागरूकता की दिशा में अपने संस्था व कार्यकर्ताओं के माध्यम से  ८-१० पेज की प्रकाशित एक छोटी सी  बुकलेट कोरोना की पृष्ठभूमि की जानकारी साझा करने के उद्देश्य से आम जनता में वितरित की गयी है।  यह पुस्तक  एक तरह से दिग्दर्शिका का कार्य करती है कि कैसे कोरोना संक्रमण के शुरुआती दौर में ही लोगों को इसका आभास हो जाने पर क्या-क्या सावधानियाँ बरतनी होगी , इसमें टेली मेडिसिन की सुविधा एवं टीकाकरण आदि की भी जानकारी उपलब्ध करायी गयी है।

इसके अलावे, डॉ पालीवाल ने बताया कि वे कोरोना के प्रति जनजागरूकता अभियान के तहत साम्य-समय पर वेबिनार आयोजित कर रहें हैं। साथ ही, तेलंगाना एवं मध्य प्रदेश राज्यों में किये जा रहे अपने प्रयासों का जिक्र करते हुए बताया कि कैसे वे सरकार एवं स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर इस दिशा में दृढ़ता से कार्य कर रहे हैं। जैसे कि सीनियर डॉक्टर्स के माध्यम से आशा वर्कर एवं आँगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को इस वैश्विक महामारी से बचाव के लिए प्रशिक्षण देना तथा समाज के वरिष्ठ एवं गणमान्य व्यक्तियों  की मदद से टीकाकरण के प्रति जागरूकता के अभियान को सर्वजन तक पहुँचाने का प्रयास करना आदि । 

संक्षेप में, डॉ पालीवाल ने कहा कि कोरोना के प्रति जनजागरूकता अभियान की मिलीजुली प्रतिक्रिया मिल रही हैं।  इस मायने में यह कहना गलत न होगा कि जहाँ जागरूकता होगी , वहाँ बचाव होगा ही । उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार की खुलकर प्रशंसा करते हुए बताया कि हाल ही में कैसे राज्य सरकार ने कोरोना वैक्सीन के महाअभियान के अन्तर्गत एक लिस्ट जारी की थी  जिसमें प्रदेश के २० जिलों को लक्षित किया गया था,जहाँ  वैक्सीन लेने वालों की बड़ी तादाद  ने  सरकार के इस प्रयास को सार्थकता प्रदान की। इस शुभकार्य हेतु प्रदेश सरकार ने अपने आधिकारिक परिसर में ही टीकाकरण केंद्रों को स्थापित करने की अनुमति दे दी है।

 इसके अलावे, उन्होंने जनजागरूकता अभियान में नवयुवकों की भूमिका की भी सराहना करते हुए बड़ी ही रोचक जानकारी साझा की।  उदाहरण के लिए- हरियाणा राज्य के गुड़गाँव एवं मेवात इलाकों में अचानक कोविड वैक्सीन के प्रति जन स्वीकार्यता बढ़ी।  जिसका श्रेय इन क्षेत्रों के उन नवयुवाओं को जाता है जो कि प्रतिदिन अपने जीवन का १ घंटा समाज सेवा के कार्यों  में लगाते हैं।

इन युवकों में विशेषकर आईटी इंजीनियर , बीपीओ कर्मचारी आदि शामिल थे।  इस संदर्भ में, उनकी भूमिका और महत्वपूर्ण इसलिए हो जाती है क्योंकि इन क्षेत्रों में लोगों तथा समाज के तथाकथित कुछ ठेकदारों  की अनभिज्ञता एवं हटधर्मिता के कारण टीकाकरण अभियान में चुनौतियाँ आ रही थीं। इन्हीं युवाओं के प्रयासों से उपरोक्त वर्णित क्षेत्रों में  ग्रामीण स्तर पर डॉक्टरों व सुमदायिक प्रतिनिधियों के माध्यम से टीकाकरण का अभियान सहजता से शुरू किया गया। 

अंत में, डॉ पालीवाल ने बताया कि जब देश में कोरोना की  लहर की विभीषिका की शुरुआत हुई थी तो देश के ४-५ प्रदेशों में केवल १० संस्थानों   का जुड़ाव हमारे अभियान से रहा ।  यह एक सुखद परिणाम ही है कि विगत २ महीनों के अंदर देश के १५ प्रदेशों  की लगभग ५० संस्थाएँ अबतक इस अभियान में जुड़ चुकी हैं।  अतः इस अभियान को देश के सम्पूर्ण  गाँव तक पहुंचाने के क्रम में, लगभग ५ लाख कार्यकर्ताओं की जरुरत है क्योंकि हम चाहते हैं कि हर गाँव में एक कार्यकर्ता जरूर भेजें। 

कोरोना की तीसरी लहर के मद्देनज़र -आगे की राह

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डॉ सुरेश गर्ग ने वार्ता के समापन में अपने विचार रखते हुए कहा कि एक डॉक्टर होने के नाते जब मैं भारतीय ग्रामीण व्यवस्था में गाँधीजी के ग्राम स्वराज्य के पहलूओं का आकलन करता हूँ तो स्वास्थ्य के मुद्दे पर एक बड़ा विरोधाभास दर्शाता है।  यह विरोधाभास ठीक उसी तरह है जैसे कि गाँव और शहर में वैचारिक अंतर अथवा यूँ कहें कि भारत एवं इंडिया की संकल्पना में अलगाव। उदाहरणार्थ- गाँव में लोग अपनी छोटी-सी- छोटी चिकित्सीय आवश्यकताओं के लिए बिना ज्यादा परेशान हुए स्थानीय नीम – हक़ीम से अपना इलाज़ कराते हैं।

इस संदर्भ में, उन्होंने अपने कुछ अनुभव एवं सुझाव साझा किये जो इस प्रकार हैं :

१. अपने कोरोना मुक्त गाँव अभियान की जानकारी देते हुए बताया कि कोरोना सम्बन्धित जनजागरूकता  एक लम्बी प्रक्रिया है।  जिसके लिए हम  गाँवों के शिक्षित, वरिष्ठ एवं सेवा निवृत व्यक्तियों का चयन कर उन्हें स्वास्थ्य सम्बन्धी बुनियादी प्रशिक्षण प्रदान देने की योजना बनाई है।

२. इन स्थानीय नागरिकों को चयनित करने का एक उद्देश्य यह भी है कि वे आसानी से वहाँ की जनता की स्वास्थ्य -संबंधी समस्याओं को समझते हुए , उन्हें उनकी ही भाषा में समस्याओं का निवारण के उपाय उपलब्ध करा सकते हैं। 

३. साथ ही, यहाँ उन्होंने ग्रामीण स्वास्थ्यकर्मियों से जुड़ी बेहद महत्वपूर्ण चुनौतियों को जाहिर करते हुए बतलाया कि कैसे आशा वर्कर्स एवं आँगनवाड़ी कार्यकर्ता अपने कर्तव्यों का पालन गंभीरता से नहीं करते क्योंकि वे अपनी आर्थिक स्थितियों के कारण अपने तथा अपने परिजनों के लाभ के जुगाड़ में ही लगे रहते हैं। इसके अलावे, वे सरकारी निर्देशों को भी सामान्य जनता में भ्रामक तरीकों से साझा करते हैं। 

उन्हें स्वयं इन निर्देशों की सही ज्ञान एवं जानकारी नहीं होती , परिणामत: वे अगंभीरता का परिचय देते है। उनके द्वारा ग्रामीणों को दी गयी जानकारियाँ सरकारी जनसंचार के माध्यमों [दूरदर्शन व रेडियो आदि पर प्रसारित जनसूचना] से सर्वथा भिन्न साबित होती है। इन स्वास्थ्यकर्मियों की अकर्मण्यता का दंश इन भोली-भली  ग्रामीण जनता  को  ताउम्र झेलना पड़ता है क्योंकि इनके सिवाय स्थानीय स्तर पर उन्हें यथाशीघ्र जानकारी उपलब्ध कराने हेतु  अन्य कोई वैकल्पिक सुविधा मौजूद नहीं होता।

४. अंत में, डॉ गर्ग ने श्री पालीवाल जी से निवेदन किया कि इस कोरोना मुक्त गाँव अभियान के अन्तर्गत स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को तैयार करने के क्रम में उन्हें ‘बुनियादी प्राथमिक उपचार’ के लिए भी प्रशिक्षण दिए जाने की आवश्यकता है, ताकि महामारी के मामलों से इतर अन्य छुटपुट उपचार हेतु इन कर्मियों से नि:संकोच चिकित्सीय सहायता प्राप्त की जा सकें। साथ ही, इन कर्मियों को सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी उपयोग में लाते हुए ग्रामीण-स्वच्छता, पर्यावरण सुरक्षा , जल संरक्षण एवं जनजागरूकता के अभियानों आदि के लिए प्रशिक्षण प्रदान किया जा सके।

वहीं,  “बुंदेलखंड के वाटरमैन” डॉ संजय सिंह ने इस वार्ता को एक महत्वपूर्ण पहल बताते हुए, अपने कुछ सुझाव दिए जो निम्नांकित हैं :

१. उन्होंने वार्ता के शीर्षक का विश्लेषण करते हुए कहा कि आज देश भर में सामाजिक संगठन कार्यरत है ,अतः गाँधीवादी दर्शन के आधार पर यह अलग तरह का दौर है, जिसके अपने निहितार्थ परिलक्षित हैं ।  यदि कोरोना की पहली लहर में विभिन्न सामाजिक संगठनों की भूमिका का विवेचन किया जाये तो अत्यंत ही प्रशंसनीय है। हालाँकि दूसरी लहर के शुरुआती दिनों में इन संगठनों के योगदान कम देखने को मिली।

२. यहाँ डॉ सिंह ने अपनी संस्था के प्रयासों का उल्लेख करते हुए बताया कि कैसे उन्होंने इस कोरोना काल में ही ग्रामीण विकास की दिशा में कई कार्यों का भली-भांति संपादन किया। इस क्रम में  सबसे पहले बुंदेलखंड इलाके के लगभग ७० गाँवों को चिन्हित किया गया। इस संदर्भ में,  एक रोचक तथ्य यह है कि कुल १३१ ग्रामीणों ने अपने श्रमदान से जल संरक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित की।

३. डॉ सिंह ने ढृढ़तापूर्वक कहा कि  ऐसे जन प्रयासों को प्रोत्साहित करने  बहुत जरुरत है।  यह भी साझा किया कि कोरोना मुक्त गाँव अभियान के अंतर्गत सामुदायिक पोषण वाटिका की योजना में  वृक्षारोपण को कैसे कारगर किया जा सकता है।

४. अतः ग्रामीण विकास की दिशा में यह भी तय किया जाना जरुरी है कि कैसे ग्राम योजनाओं के निर्माण से लेकर उनकी समय-समय पर मूल्यांकन किया जाये।  इस संबंध में, स्थानीय स्तर पर निगरानी समितियों की स्थापना एवं उनकी भूमिका तय किया जाना जरुरी है।  साथ ही, ग्रामीण व्यवस्था में उपलब्ध साधनों का एक विस्तृत  ख़ाका तैयार किये जाने की जरुरत है ताकि आवश्यकतानुसार  उन संसाधनों का उचित प्रयोग करते हुए भविष्य के लिए भी संरक्षण व भण्डारण के प्रयत्न किये जाएँ।

५. अंत में, डॉ संजय सिंह ने भी यह स्वीकारा कि हाल के दिनों में लोगों में टीकाकरण को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने मिली है।  साथ ही, उन्होंने डॉ पालीवाल से “कोरोना बुकलेट” की सॉफ्ट कॉपी का निवेदन किया ताकि उसे अपने क्षेत्र के ग्रमीणों में वितरित कर सकें।

इम्प्री के डॉ अर्जुन कुमार ने इस व्याख्यान के मुख्य वक्ता डॉ पालीवाल जी से अन्य प्रश्न पूछा – आप गाँधीजी के सत्याग्रह के सिद्धांत को वर्तमान परिदृश्य में किस रूप में देखते हैं ? साथ ही, कोरोना मुक्त गाँव अभियान के अन्तर्गत स्वयंसेवा एवं श्रमदान देकर ग्रामोत्थान की दिशा में आपके क्या विचार हैं – हम इन प्रयासों से कैसे ग्राम स्वराज्य के पथ पर आगे बढ़ सकते हैं?

डॉ पालीवाल ने उपरोक्त प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि गाँधीजी का सत्याग्रह मुख्यत: निःस्वार्थ भाव से किया गया रचनात्मक कार्यों की श्रेणी में आने वाला वह अथक प्रयास है , जिसमें अहिंसा एवं सत्य का पुट विराजमान होगा।  यहाँ उन्होंने उन सभी सामाजिक संगठनों पर कुठाराघात किया जो केवल निजी स्वार्थ व दिखावे की भावना से ग्रसित होकर,  बिना किसी सत्यनिष्ठा के एवं  बेमन तरीके से उन ग़ैर -सरकारी संगठनों का संचालन करने की दिशा में  सस्ती लोकप्रियता की तलाश में समाज सेवा जैसे पवित्र कार्य का अपमान ही कर रहे हैं।  यदि गाँधीजी के सत्याग्रह की अवधारणा का तार्किक विश्लेषण करें तो यह प्रदर्शित होता कि सत्य सर्वदा स्वार्थ-लोलुपता से परे होता है तथा वह यश की कामना कभी भी नहीं करता। 

यहाँ मुख्य वक्ता ने यह भी साझा किया कि कैसे उन्होंने अपने सेवाकाल के दौरान बहुत कम पूँजी अथवा वित्तीय फण्ड के सहारे ग्राम विकास के कार्यों का निष्पादन बखूबी करवाया है।  इस क्रम में, डॉ पालीवाल जन भागीदारी एवं ग्रामीण व्यवस्था में  तीन स्तरों पर श्रमदान की महत्ता को दर्शाया।  जैसे कि -कुछ ऐसे कार्य,  जिनको स्वयं गाँव वाले श्रम दान से पूरा कर सकते है।  उदाहरण- वृक्षारोपण , तालाब का गहरीकरण इत्यादि। साथ ही, उन्होंने बताया कि अब मनरेगा में उपरोक्त वर्णित जीर्णोद्धार कार्य नहीं हो रहा। 

यह सारे ग्रामीण कायाकल्प के कार्य स्थानीय स्तर पर ग्रामीणों के सहयोग एवं प्रयास द्वारा ही पूर्ण किया जा रहा है। इन कार्यों में सरकार तथा प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका एवं हस्तक्षेप भी नगण्य होती है , जिसका सुखद परिणाम यह होता है कि ऐसे ग्राम्य-योजनाओं में अर्थ दान की भी पारदर्शिता बनी रहती है और भ्रष्टाचार अथवा कमीशन जैसी समस्या ही उत्पन्न के जोख़िम भी नहीं होते। 

यहाँ उन्होंने विशेष रूप से सतपुड़ा इलाके के एक आदर्श ग्राम का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे वहाँ के विभिन्न स्थानीय  हितधारकों ने अपने सामूहिक प्रयत्नों व  श्रमदान  द्वारा ग्रामीण-सौंदर्यीकरण की दिशा में कई रचनात्मक कार्यों को अंतिम रूप प्रदान किया।  अंत में, यह भी कहा कि इन रचनात्मक कार्यों की सारगर्भिता तभी है जब इन्हें सच्चाई के साथ बिना किसी यश की कामना के किये  तन्मयता पूर्ण समर्पण से संपादित  किया जाये। 

डॉ पालीवाल जी ने अपने व्याख्यान के अंतिम कुछ बिंदुओं को रेखांकित किया जो कि इस प्रकार हैं:

१. हम गाँधीजी के सिद्धांत पर चलकर बहुत अच्छे से कोरोना मुक्त हो सकते हैं। इस के लिए सभी ग्रामीण इकाईयों  में  जन जागरूकता संबंधी  कार्यक्रमों पर जोर दिए जाने की जरुरत है। उन्होंने माना कि कोरोना के प्रति सजगता, संक्रमण से  बचाव के उचित उपायों को अपनाकर एवं टीकाकरण की प्रक्रिया को पूर्ण कर – कोरोना की तीसरी लहर से बहुत हद तक बच सकते हैं। साथ ही, उन्होंने १८ वर्ष से कम आयु वर्ग के अंतर्गत आने वाले बच्चों को  इस  लहर से बचा के रखने की सलाह दी क्योंकि ये ही वो वर्ग -समूह हैं जिनके लिए वर्तमान में टीकाकरण की सुविधा उपलब्ध नहीं है।

२. डॉ पालीवाल ने तीसरी लहर के न आने की ज्यादा संभाव्यता का जिक्र करते हुए ख़ासतौर पर, मानव-जनसंख्या केंद्रों व क्षेत्रों के प्रति चिंता व्यक्त जो अभी भी टीकाकरण की प्रक्रिया से वंचित हैं। अतः उन्हें कोविड की आगामी लहर में  संक्रमण से बचने की सलाह देते हुए,  उचित रोकथाम व व्यवहारों को अपनाने के लिए भी प्रेरित किया। 

३. इसके अलावे, उन्होंने सरकारी प्रयासों द्वारा कुछ नितांत पहलूओं पर भी काम करने का सुझाव प्रदान किया।  जैसे कि मानसिक स्वास्थ्य की समस्यायेँ , बेरोज़गारी की समस्या एवं प्रवासी श्रमिकों आदि की समस्याएँ। इस संदर्भ में, ग्रामीण स्तर पर मनरेगा जैसी सरकारी योजनाओं को तेजी से बढ़ाये जाना चाहिए ताकि जो भी  ग्रामीण व्यक्ति,  इससे जुड़ना चाहे स्वेच्छा से आगे आये। 

४. अतः ग्रामीण योजनाओं के कार्यों में कुछ अन्य गतिविधियों को भी शामिल किये जाने की जरुरत है।  जैसे कि व्यापक पैमाने पर वृक्षारोपण। साथ ही , डॉ पालीवाल ने कहा  कि अभी तो पूरे भारत में मानसून है, जो कि वृक्षारोपण के उद्देश्य से अनुकूल है। इसी क्रम में , उन्होंने सरकार , विभिन्न सामाजिक संगठनों एवं ग्रामीणों -तीनों के सामूहिक प्रयास की उम्मीद जतायी। 

५. इसके अलावे, उन्होंने प्रवासी श्रमिकों को पुनः कृषिकार्य से जुड़ने की सलाह देते हुए,  उन्हें सब्ज़ियों की खेती को भी रोजगार के अन्य साधनों में शामिल करने का एक अच्छा विक्लप बताया ।  डॉ पालीवाल ने उत्तर प्रदेश राज्य के आगरा जिले के एक केंद्र पर की गयी ऐसी पहल का भी उल्लेख किया और बताया कि कैसे सघन खेती के तरीकों से ज्यादा लोगों को एक ही समय पर रोज़गार मिल पाना संभव हुआ है। 

६. डॉ पालीवाल ने ग्रामीणों की धैर्य, साहस, कर्मठता एवं उनके किसी भी विषम परिस्थितियों में अनुकूलन का परिचय देते हुए[उन्हें प्राकृतिक आपदाओं आदि से भी निपटने की अद्भुत जिजीविषा होती है ] – इस तरह से डटे रहने की खूबियाँ ही इन्हें जुदा बनाती हैं।  ज्ञातव्य है कि गाँव के लोग खुद को समय एवं मौसम के हिसाब से ढ़ाल लेते हैं।  जहाँ शहरों में लोगों को एयर कंडीशनर की आदत होती है, वहीं ग्रामीणों को गाँव की खुली हवा ही लुभाती है।

७. अतः हम सभी नागरिकों  को  भ्रातृत्व  एवं सहयोग की भावना का सच्चा परिचय देते हुए  इन ग्रामीणों के उत्थान की दिशा में उन्हें थोड़ी हिम्मत एवं जागरूकता  प्रदान करनी होगी।  तभी हम सही अर्थों में वर्तमान सामाजिक संरचना में गाँधीजी के ग्राम स्वराज्य की संकल्पना को  साकार करते हुए इस कोरोना की तीसरी लहर से लड़ने के लिए ग्रामीणों को हर तरह से तैयार कर सकते हैं।

८. अंत में, डॉ पालीवाल जी ने कहा कि यदि हर सजग नागरिक थोड़ा-थोड़ा अपने समय, धन एवं श्रम का दान करें तो हम सभी इस वैश्विक आपदा से निकल जाएँगे क्योंकि पिछली दो लहरों के अनुभव यह दर्शाते हैं कि यदि उचित सतर्कता एवं जागरूकता लगातार जारी रहें तो विकट परिस्थितियों का सामना आसानी से किया जा सकता है। 

इस व्याख्यान की समाप्ति डॉ सुरेश गर्ग के विचारों से हुई , जहाँ उन्होंने इस परिचर्चा सार्थक करार देते हुए सभी का आभार प्रकट किया।  संक्षेप में, उन्होंने सरकार को दो बिंदुओं पर गंभीरता से विचार करने की सलाह दी-

१. देश में अब भी कोरोना को लेकर लोगों में  भ्रम की स्थिति बनी हुई , समाज अलग-अलग तरह के नुस्ख़े  व्याप्त हैं।  अतः सरकार एवं प्रशासन का ज्यादा समय एवं ऊर्जा  इन ग़ैर -जरुरी मुद्दों को हल करने में चला जा रहा , जिससे इस आपदा से निपटने में चुनौतियाँ आ रही हैं। इस दिशा में, समाज के विभिन्न हितधारकों को आपस में विचार-विमर्श करने की नितांत आवश्यकता है। 

२. लोगों के टीकाकरण संबंधी सभी संदेहों  को भी जल्द दूर किये जाने की जरुरत है। इस क्रम में, अस्पताल की व्यवस्था एवं टीकाकरण अदि की प्रक्रियाओं को भी दुरुस्त किये जाने की जरुरत है।  साथ ही, इस आपदा की घड़ी में लोगों को उचित  नैतिक समर्थन एवं मनोवैज्ञानिक परामर्श देकर उनके मानसिक स्वास्थ्य को भी सुनिश्चित किया जाना एक अपरिहार्य पहल सिद्ध होगा।  

स्वीकृति: प्रियंका, चिन्मय विश्वविद्यालय, कोच्चि केरल, एमए (पीपीजी) कोर्स, IMPRI में रिसर्च इंटर्न भी हैं । 

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